Mesha Sankranti 2020 :सतुआन पर्व: 13 अप्रैल को सूर्य का मेष राशि में प्रवेश, खरमास समाप्त व शुभ कार्य प्रारम्भ




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भारतीय संस्कृति अनेकता में एकता का मूल भाव ही पूरी दुनिया को भारत के करीब लाता है। इसी मूल भावना को मजबूत करने वाले अलग-अलग धर्मों के अनेक त्योहार यहां साल भर मनाए जाते हैं। मेष संक्रान्ति एक ऐसा ही राष्ट्रीय त्योहार है। जिसे देश के विभिन्न भागों में रहने वाले सभी धर्मपंथ के लोग अलग-अलग तरीके से मनाते हैं।


मेष संक्रान्ति पुण्य काल मुहूर्त | Mesha Sankranti Punya Kaal Muhurta:-


मेष संक्रान्ति :- सोमवार, अप्रैल 13, 2020 को
मेष संक्रान्ति पुण्य काल :-11:48 ए एम से 06:10 पी एम
अवधि :- 06 घण्टे 21 मिनट्स
मेष संक्रान्ति महा पुण्य काल :- 04:03 पी एम से 06:10 पी एम
अवधि :- 02 घण्टे 07 मिनट्स
मेष संक्रान्ति का क्षण :- 08:39 पी एम


मेष संक्रान्ति का महत्व | Importance of Mesha Sankranti :-


भारत की संस्कृ्ति में अनेक राज्य, अनेक धर्म, अनेक भाषाएं, अनेक रीति-रिवाजों को मानने वाले लोग एक साथ रहते है। अनेक संस्कृ्तियों का एक साथ रहना, हमें विश्व में एक नई पहचान देता है। साथ ही यह हमारी देश की अंखण्डता को ठीक उसी प्रकार सौन्दर्य प्रधान करता है, जिस प्रकार एक गुलदस्ते में कई रंग के फूल हों, तो उसकी सुन्दरता स्वयं ही दोगुनी हो जाती है।मेष संक्रान्ति का पर्व भी भारत के लोगों को आपस में बांधे रखने में सहयोग करता है। क्योंकि  इस पर्व को भारत के प्रत्येक भाग में किसी न किसी रुप में मनाया जाता है। कई धर्म इसे अपने ढंग से मनाते है। ऎसे में इस पर्व का महत्व बढ़ जाता हैं।

देश में अलग- अलग स्थानीय नामों से जानते हैं मेष संक्रान्ति को :-




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बता दें कि देश में मेष संक्रान्ति को स्थानीय नामों से जाना जाता है। इसलिए हर जगह इसे अलग- अलग नाम से पुकारा जाता है।बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश क्षेत्र में यह दिन ‘सतुआ संक्रांति’,‘सतुआनी’ या सतुआन त्योहार के रूप में इसे मनाया जाता है तो पंजाब में वैशाखी त्योहार के रूप में इसे मानते है।बंगाल में भी इस दिन को नववर्ष के रूप में मनाते हैं। असमी लोग बैसाख के शुरू में बोहाग बिहू या रोंगली बिहू मनाते हैं। यह दिन असमिया नववर्ष की शुरुआत भी है। मणिपुर में ‘चेरोवा’, तमिलनाडु में ‘चितरार पिरावि’ के नाम से मनाते हैं। इस प्रकार यह पर्व एक ही दिन पूरे देश में नई ऊर्जा का संचार करता है।पर्व की वैज्ञानिक दृष्टि यही है कि यह पर्व अप्रैल माह में मनाया जाता है, तब यह समय ग्रीष्म के आगमन और शीत ऋतु के मौसम की समाप्ति की ओर होता है। मध्यम तापमान होने से जहां पेड़-पौधे फलते-फूलते हैं, वहीं प्राणी जगत भी नई ऊर्जा से भर जाता है।

बिहार व भोजपुरी भाषी,उत्तर प्रदेश और झारखंड क्षेत्र में सतुआन :-



मेषसंक्रांति के दिन बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में सतुआन पर्व या सतुआ संक्रांति मनाई जाती है।सतुआन भोजपुरी संस्कृति के काल बोधक पर्व है। हिन्दू पतरा में सौर मास के हिसाब से सूरज जिस दिन कर्क रेखा से दक्षिण के ओर जाता है उसी दिन यह पर्व मनाया जाता है।बिहार व भोजपुरी भाषी, उत्तर प्रदेश और झारखंड क्षेत्र में मनाया जाने वाला सतुआन पर्व इस बार 13 अप्रैल,सोमवार को है। बिहार में इस पर्व को खास तरीके से मनाया जाता है। इस दिन लोग गंगा में स्नान करते हैं और पुण्य का काम करते हैं; इस दिन लोग जल से भरा घड़ा, पंखा और सत्तू दान करते हैं। लोग चना-जौ के सत्तू आम या आम की चटनी का भगवान को भोग लगाते हैं और सत्तू छूकर पुरोहित को दान करते हैं। साथ ही गुड़ का भी भगवान को भोग लगाया जाता है। इस दिन सुबह के समय घरों में पकवान नहीं बनाए जाते।सत्तू से बने पकवान खाये जाते हैं जैसे सत्तू का शर्बत,सत्तू भोजन ,सत्तू के लड्डू ,आम के टिकोला के चटनी और गुड़ इत्यादि । इस दिन सूर्य देव की उपासना करते हैं व सत्तू के सेवन को शुभ माना जाता है। कहते हैं मेष संक्रान्ति पर भगवान शिव, विष्णुमां काली की पूजा की जाती है। शिव मन्दिरों में आज से ही घड़ों मे पानी भरकर शिवलिंग पर लगा दिया जाता है।सतुआन के दिन खरमास समाप्त हो जाता हैं।इस दिन सात्विक भोजन ग्रहण करना उत्तम माना जाता हैं ।




शादी, गृह प्रवेश, गृह निर्माण, कर्ण छेदन संस्कार, बीज मुहूर्त, कूप आरम्भ, वधू प्रवेश, यज्ञोपवित संस्कार, प्राण प्रतिष्ठा संस्कार आदि शुभ कार्य इस अवधि में सपन्न किए जा सकते हैं। लाॅकडाउन के चलते ये सभी शुभ कार्यों को करने से पहले सरकारी अनुमति अवश्य लें ले। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश होने पर सभी शुभ कार्य प्रारम्भ हो जाएंगे। इस दिन स्नान- दान का विशेष महत्व है। यदि आप घर के बाहर नदी या नहर में स्नान करने न जा पाएं तो घर पर ही गंगा जल की दो बूंद बाल्टी भर पानी में मिला कर स्नान कर लें। इससे भी उतना ही पुण्य मिलेगा।

इस दिन पितरों को सन्तुष्ट करने के लिये सत्तू, गुड़, चना, पँखा, मिट्टी का घड़ा, आम, फल आदि का दान पंडितों के बीच किए जाने की परम्परा भी हैं ।

सामाजिक दृष्टि से विचार करें तो सतुआन आम के वृक्षों में लगे नए फलों और जौ,चने की नई फसलों का उत्सव होता हैं इस दिन किसान नई फसलों के लिए प्रकृति का धन्यवाद प्रकट करते हैं ।

कहा जाता है कि भगवान बुद्ध को भी इस पवित्र दिन को ही महाबोधित्सव प्राप्त हुआ था। 


उड़ीसा में मेष संक्रान्ति पर्व एक नये रुप में :-


उड़ीसा समाज मेष संक्रान्ति के दिन अर्थात 13 अप्रैल को पोणा संक्रान्ति पर्व के नाम से मनाता है। इस दिन यहां महिलाओं द्वारा शिवजी की पूजा कर दही-गुड से बनाया गया पोणा अर्पित किया जाता है। मंदिरों में अन्न और वस्त्र दान किये जाते है। इस दिन बनने वाले व्यंजनों में चावल की खीर विशेष रुप से मनाई जाती है। बैंगन, केला, आलू, कद्दू का डालमा बनाया जाता है। तथा अपने ईष्ट देव की पूजा कर पूरे वर्ष बारिश की कामना के साथ ही सुख-समृ्द्धि की प्रार्थना भगवान से की जाती है।

बंगाल में नववर्ष प्रारम्भ :-


बंगाल का नया वर्ष वैशाख महीने के पहले दिन अर्थात इस बार 13 अप्रैल से प्रारम्भ हो रहा  है। इस दिन को यहां शुभो नाँबो बाँरसो के नाम से जाना जाता है। बंगाल में इस दिन से ही फसल की कटाई शुरु होती है। यहां के लोग इस दिन नया काम करना शुरु करते है। महिलाएं इस दिन घर आई नई फसल के धान से पकवान बनाती है।

केरल का नववर्ष प्रारम्भ :-


भारत के दक्षिणी प्रदेश केरल में इस दिन धान की बुआई का काम शुरु होता है। इस दिन को यहां मलयाली न्यू ईयर विशु के नाम से पुकारा जाता है। मेष संक्रान्ति के दिन हल और बैलों को रंगोली से सजा कर, इनकी इस दिन पूजा की जाती है और बच्चों को उपहार दिये जाते है।

वैशाखी के दिन को मलयालम समाज नये साल के रुप में मनाता है। इस दिन मंदिरोम में विशुक्कणी के दर्शन कर समाज के लिये नव वर्ष का स्वागत करते है। इस दिन केरल में पारंपरिक नृ्त्य गान के साथ आतिशबाजी का आनन्द लिया जाता है। विशेष कर अय्यापा मंदिर में इस दिन विशेष पूजा अर्चना की जाती है। विशु यानी भगवान “श्री कृ्ष्ण” और कणी यानी “टोकरी”

विशुक्कणी पर्व के नाम से जाना जाने वाले इस पर्व पर भगवान श्री कृ्ष्ण को टोकरी में रखकर उसमें कटहल, कद्दू, पीले फूल, कांच, नारियल और अन्य चीजों से सजाया जाता है। सबसे पहले घर का मुखिया इस दिन आंखें बंद कर विशुक्कणी के दर्शन करता है। कई जगहों पर घर के मुखिया से पहले बच्चों को देव विशुक्कणी के दर्शन कराये जाते है। नव वर्ष पर सबसे पहले देव के दर्शन करने का उद्देश्य, शुभ दर्शन कर अपने पूरे वर्ष को शुभ करने से जुडा हुआ है।

असम में मेष संक्रान्ति पर्व का एक नया रुप “ बिहू ” :-


मेष संक्रांति के दिन अर्थात वैशाखी पर्व को असमिया समाज एक नये रुप में मनाता हे। यहां यह पर्व दो दिन का होता हैं । वैशाखी से एक दिन पहले असम के लोग बिहू के रुप में इस पर्व को मनाते है। जिसमें मवेशियों कि पूजा की जाती है तथा ठीक  वैशाखी के दिन यहां जो पर्व मनाया जाता है, उसे रोंगली बिहू के नाम से जाना जाता है।

इस दिन असम में कई सांस्कृ्तिक आयोजन किये जाते है। आनंद और मनोरंजन इस पर्व का महत्वपूर्ण पक्ष है। युवा परंपरागत बिहू नृत्य करते हैं। क्योंकि कोई भी पर्व बिना व्यंजनों के पूरा नहीं होता है। इसलिये खाने में इस दिन यहां “पोहे” के साथ दही का आनन्द लिया जाता है। असम का जीवन कृ्षि से जुड़ा हुआ होने के कारण लोग यह कामना करते है कि पूरे वर्ष अच्छी बारिश होती रहे।

तमिल का नववर्ष प्रारम्भ :-


तमिल के लोग मेष संक्रान्ति के दिन से नये साल का प्रारम्भ मानते है। इस दिन को तमिल लोग पुथांदु पर्व के नाम से मनाते है।

कश्मीर में नववर्ष का प्रारम्भ :-


शास्त्रों में उल्लेखित सप्तऋषियों के अनुसार मेष संक्रान्ति का दिन नवरेह नाम से, नववर्ष के महोत्सव के रुप में मनाया जाता है। यहां इस दिन लोग एक -दुसरे को बधाई देते है, तथा हर्ष और खुशी के साथ एक -दूसरे के घर मिलते आते है। कोई नया कार्य प्रारम्भ करने के लिये इस दिन को यहां विशेष रुप से प्रयोग किया जाता है।

आंघ्रप्रदेश का नववर्ष प्रारम्भ :-


भारत के अधिकतर त्यौहार कृ्षि आधारित है। भारत के जिन प्रदेशों में आजीविका का मुख्य साधन कृ्षि है, उन सभी प्रदेशो में फसल के पकने या घर आने पर उस दिन को एक पर्व के रुप में मनाया जाता है। आंध्रप्रदेश भी क्योंकि एक कृ्षि क्षेत्र है। इसलिये मेष संक्रान्ति का दिन किसानों के लिये यहाँ विशेष महत्व रखता हैं । इसे उगादि तिथि अर्थात युग के प्रारम्भ के रुप में मनाया जाता है।

महाराष्ट्र का नववर्ष प्रारम्भ :-


महाराष्ट्र प्रदेश में मेष संक्रान्ति के दिन को सृ्ष्टि के प्रारम्भ का दिन मानकर हर्षोउल्लास से मनाया जाता है। मेष संक्रान्ति के दिन से जुड़ी मान्यता के अनुसार इस दिन से समय ने चलाना शुरु किया था। महाराष्ट्र  में नववर्ष के अवसर पर श्रीखंड और पूरी बनाकर इस पर्व को मनाया जाता है। नवर्ष के दिन यहां गरीबों को भोजन व दान आदि किया जाता है और घरों में बच्चे नये वस्त्र धारण करते है।

इस प्रकार भारत के कोने-कोने में यह पर्व किसी न किसी रुप में मनाया जाता है। वैशाखी जैसे पर्व भारत कि संस्कृ्ति को अखंड बनाये रखने में सहयोग करते है। यह पर्व भारतियों को एकता, भाईचारे और उन्नति के सूत्र में बांधे रखने में सहायता करता है।

मेष संक्रान्ति पंजाब प्रांत में :-


जहां हिंदू धर्म पंचांग के अनुसार यह त्योहार मेष संक्रांति एवं वैशाख मास के प्रारंभ होने पर मनाया जाता है। वहीं देश के पंजाब प्रांत में और सिक्ख धर्मावलंबियों के बीच यह त्योहार बहुत उत्साह और उमंग से मनाया जाता है। सिक्ख समाज के लिए यह त्योहार धार्मिक एवं सामाजिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है।

सिक्ख धर्म के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने वैशाखी के दिन ही खालसा-पंथ की नींव डाली। ‘खालसा’ खालिस शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है- शुद्ध, पावन या पवित्र। खालसा-पंथ की स्थापना के पीछे गुरु गोविंद सिंह का मुख्य लक्ष्य लोगों को तत्कालीन मुगल शासकों के अत्याचारों से मुक्त कर उनके धार्मिक, नैतिक और व्यावहारिक जीवन को श्रेष्ठ बनाना था। इस पंथ के द्वारा गुरु गोविंद सिंह ने लोगों को धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव छोड़कर इसके स्थान पर मानवीय भावनाओं को आपसी संबंधों में महत्व देने की भी दृष्टि दी। इसलिए छुआछूत की भावना को खत्म करने के उद्देश्य से ही उन्होंने वैशाखी के पवित्र दिन ही श्री गुरु गोविंद सिंह ने पंजाब के श्री केशगढ़, आनंदपुर साहिब में अपने चेलो, जो पंच प्यारे के नाम से प्रसिद्ध हैं और अलग-अलग जाति के थे, को अमृत पिलाया और उन चेलों के हाथों स्वयं अमृत पीकर सिंह नामक उपाधि प्राप्त की। साथ ही उन्होंने अपने गुरु का पद छोड़कर गुरुग्रंथ साहिब को सर्वोपरी मानकर गद्दी पर रख नई परंपरा की शुरुआत की। इस प्रकार इस शुभ दिन से ही गुरु गोविंद सिंह ने सिक्ख धर्म के साथ ही पूरे मानव समाज की धार्मिक, सामाजिक विचारधारा को नई दिशा दी।

इस दिन गुरुद्वारों में विशेषकर आनंदपुर साहिब में अरदास, शबद कीर्तन सहित कड़ा प्रसाद का वितरण, लंगर आदि विशेष धार्मिक आयोजन किये जाते हैं।

सामाजिक दृष्टि से विचार करें तो पंजाब देश का मुख्य कृषि प्रधान प्रांत है। जहां गेंहू की पैदावार काफी अधिक मात्रा में होती है। अत: इस क्षेत्र के अनके लोगों की आजीविका खेती से जुड़ी है। यही कारण है कि जब भी रबी की फसल पककर तैयार होती है, तब यहां पर उमंग और उत्साह का माहौल बन जाता है। वैशाखी पर्व पर यह सभी लोग मिलकर अच्छी फसल होने की खुशी को एक-दूसरे से बांटते हैं। इस पर्व पर सभी विशेष रूप से पंजाब का लोकनृत्य भांगड़ा और गिद्दा करते हैं। वास्तव में इन नृत्यों के पीछे भाव यही होता है कि सालभर की कड़ी मेहनत के बाद अच्छी फसल के रूप में जो सुपरिणाम मिला, अब उसकी कटाई के बाद सारी थकान मिटाकर आने वाले मौसम के लिए तन और मन को एक नई ऊर्जा से भरा जाए। ऐसा कर वे अपनी प्रसन्नता को इस अवसर पर प्रकट करते हैं। इस प्रकार वैशाखी मूलत: नई फसल की कटाई का उत्सव है। समय बीतने के साथ इस पर्व के साथ धार्मिक परंपराएं भी जुड़ गई। संभवत: इसीलिए कि समाज के संपन्न वर्ग के साथ ही कमजोर और निर्धन भी इस अवसर पर शामिल हो खुशीयों का आदान-प्रदान करें।बैसाखी पर्व न केवल पंजाब, अपितु पड़ोसी राज्य हरियाणा में भी मौज-मस्ती के साथ मनाया जाता है।
पिंजौर के धारामंडल में पंजाब से आए श्रद्धालु स्नान करते हुए। 

बैसाखी के साथ एक प्रसंग और भी जुड़ा हुआ है जो महाभारत काल से संबंधित है। ऐसा माना जाता है कि जब पांडव जुए में कौरवों के हाथ सब कुछ हारकर अज्ञातवास को गये थे, तभी इस दिन द्रोपदी ने स्नान की इच्छा व्यक्त की थी। उसकी इस इच्छापूर्ति के लिए पिंजौर में धारामंडल का निर्माण करवाया गया था।

यह पर्व जहां धार्मिकता से जुड़ा हुआ है, वहीं आज का दिन इतिहास के अध्याय का वह काला पृष्ठ भी है जो दमन और अत्याचारों के विरूद्ध माना गया है। 13 अप्रैल, 1919 को जब महात्मा गांधी ने रौलेट एक्ट के विरूद्ध आवाज उठाई तो पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ ऐसा माहौल बना कि पूरे देश में स्वतंत्रता के हामी नेताओं की गिरफ्तारी हुई, वहीं पंजाब में अमृतसर के लोगों ने आज ही के दिन बीस हजार की संख्या में जलियांवाला बाग में आमसभा की उस समय चार बजे अंग्रेजी हुकूमत के कुख्यात जनरल रेगिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर के आदेश पर अंग्रेज सेना ने निहत्थे लोगों पर गोलिय दागी जिसमें हजारों लोग शहीद हो गये। इस प्रकार 'बैसाखी' स्वतंत्रता संग्राम की कहानी का भी प्रतीक बन गयी।

पंजाब में आज के दिन लाखों लोग जलियांवाला बाग जाकर उन शहीदों को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने अंग्रेजों के दमन व अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठायी थी। 


यह पर्व राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधने वाला पर्व है जिसके प्रति हर वर्ग की अपार श्रद्धा है।

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