Saphala Ekadashi 2024: कब है साल की पहली एकादशी? जानिए तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त

 

पौष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी के नाम से जाना जाता हैं। इस दिन श्री हरी विष्णु और भगवान अच्युत की विधिवत पूजा करने के साथ व्रत का विधान हैं। मान्यता हैं की इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति को हर कष्टों से मुक्ति मिलने के साथ हर काम में सफलता हासिल हो सकती हैं। शास्त्रों के अनुसार, 'सफला' का अर्थ हैं 'समृद्ध होना'। इसी के कारण मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत का विधिवत पालन करने से जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता और खुशी मिलती है। इसके साथ ही प्रचुरता, सफलता, समृद्धि और भाग्य के द्वार खुल जाते हैं।

पद्मपुराण में कहा गया है कि विष्णु भगवान को सफला एकादशी के अनुष्ठान से बहुत जल्द प्रसन्न किया जा सकता है व दिनभर के उपवास एवं रात्रि जागरण से राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त किया जा सकता है। आइए जानते हैं सफला एकादशी का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र और पारण का समय। 

सफला एकादशी व्रत तिथि व पारण का समय

अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, एक दिन में 24 घंटे होते हैं और साल में 365 दिन होते हैं। वहीं, अगर हिंदू कैलेंडर की बात की जाए तो यह ​तिथियों के आधार पर चलता है, जिसके अनुसार सभी हिंदू व्रत और त्योहार मनाए जाते हैं। हिंदू कैलेंडर की तिथियां 24 घंटे से ज्यादा या कम समय की भी हो सकती हैं। साल 2023 में मलमास पड़ने के चलते एक महीने का अतिरिक्त समय बढ़ गया था, जिस कारण सफला एकादशी 2024 के जनवरी माह में मनाई जा रही है। साथ ही साल 2024 की दूसरी पौष कृष्ण एकादशी तिथि 26 दिसंबर को भी मनाई जाएगी।

सफला एकादशी तिथि - 07 जनवरी 2024, रविवार 

एकादशी तिथि शुरु- रात्रि 12:41 से 07 जनवरी 2024 (यानी 6 जनवरी की रात), इसलिए उदयातिथि में 7 जनवरी को सफला एकादशी व्रत रखा जाएगा।

एकादशी तिथि समाप्त- रात्रि 12:46 तक (08 जनवरी 2024)

पारण का समय (व्रत समाप्ति का समय ) - प्रातः 07: 15 से प्रातः 09:20 तक (08 जनवरी 2024)


सफला एकादशी पौराणिक कथा

सफला एकदशी व्रत की एक कथा भी काफी प्रचलित है कि चंपावती नगर में राजा माहिष्मान राज करते थे। उनके चार पुत्र थे। उनका बड़ा बेटा लुंपक महापापी था, उसके कुकर्मों से तंग आकर राजा ने उसे राज्य से निकाल दिया। अब लुंपक चोरी-चकारी, लूट-खसौट कर अपना गुजारा करने लगा लेकिन एक दिन सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया लेकिन राजा के डर से उसे छोड़ दिया। कहतें हैं जब प्रभु की कृपा बरसती है तो वह कुकर्मी को भी सत्कर्मी बनने का मौका देते हैं, ऐसा ही कुछ लुंपक के साथ भी हुआ। एक दिन अन्जानें में ही लुंपक से सफला एकादशी का उपवास रखा गया, दरअसल दशमी की रात लुंपक सर्दी से ठिठुरता रहा और बेहोश हो गया अगले दिन दोपहर बाद उसे होश आया।

शाम को जब वो वन से फल इत्यादि तोड़कर लाया तब तक सूर्यास्त हो चुका था लेकिन नित जीवों की हत्या कर मांसाहार करने वाला लुंपक फलों से कहां संतुष्ट होने वाला था, उसने फलों को नहीं खाया और पीपल के जिस पेड़ के नीचे रहता था उसी को समर्पित करते हुए ईश्वर से प्रार्थना की कि फलाहार वे ही ग्रहण करें। भूख के मारे वह रात भर जागता रहा इस तरह अन्जाने में ही उससे सफला एकादशी का व्रत हो गया। इस तरह भगवान प्रसन्न हुए व उसे राज्य तथा पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मिला। तत्पश्चात लुंपक एक अच्छे इंसान के रुप में पिता के पास पंहुचा और सारा वृतांत बताया पिता ने उसे अपना राज सौंप दिया और भक्ति में लीन हो गए। लुंपक ने भी 15 साल तक राज किया और उसके बाद अपने पुत्र को राज-पाट सौंप कर भगवान श्री हरि की चरणों में लीन हो गया।

सफला एकादशी व्रत व पूजा विधि

सफला एकादशी का व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को इस दिन भगवान अच्युत की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। इस व्रत की विधि इस प्रकार है-

  • एकादशी के दिन प्रात: स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर माथे पर चंदन का तिलक लगाएं।
  • इसके बाद व्रत का संकल्प लेकर भगवान को धूप, दीप, वैजयंती फूल, फल और पंचामृत आदि अर्पित करना चाहिए।
  • नारियल, सुपारी, आंवला, अनार और लौंग आदि से भगवान अच्युत का पूजन करना चाहिए।
  • इसके बाद सफला एकादशी की कथा, विष्णु मंत्र, चालीसा का श्रवण या वाचन करें। 
  • भगवान विष्णु के पंचाक्षर मंत्र ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’ का यथा संभव तुलसी की माला से जाप करें। 
  •  दीपक और कपूर से श्री हरि की आरती उतारें एवं प्रसाद सभी में वितरित करें।
  •  इस दिन रात्रि में जागरण कर श्री हरि के नाम के भजन करने का बड़ा महत्व है।
  •  व्रत के अगले दिन द्वादशी पर किसी जरुरतमंद व्यक्ति या ब्राह्मण को भोजन कराकर, दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करना चाहिये।

सफला एकादशी पर ये कार्य ना करें

  • एकादशी के दिन बिस्तर पर नहीं, जमीन पर सोना चाहिए।
  • मांस, नशीली वस्तु, लहसुन और प्याज का सेवन का सेवन न करें।
  • सफला एकादशी की सुबह दातुन करना भी वर्जित माना गया है।
  • इस दिन किसी पेड़ या पौधे की की फूल-पत्ती तोड़ना भी अशुभ माना जाता है।



 


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