मधुश्रावणी 2020: मिथिला संस्कृति का पर्व मधुश्रावणी आज से प्रारंभ, 13 दिन तक चलेगी पूजा...


'पग-पग पोखरमाछ-मखान' के लिए प्रसिद्ध मिथिला की प्राचीन जीवनपद्धति पूर्ण वैज्ञानिक है। सभी पर्व-त्योहारों का खासा वैज्ञानिक सरोकार है। प्रत्येक उत्सव में कुछ संदेश। कहीं प्राकृतिक प्रकोप से बचाव का संदेश देता श्रावण महीने की पंचमी पर नाग पंचमी हो या फिर नवविवाहितों का लोकपर्व मधुश्रावणी।

बिहार के मिथिलांचल के सबसे खास व्रत मधुश्रावणी की शुरुआत हो गई है।मिथिलांचल नारी संस्कृति का परिचायक है।मिथिलांचल क्षेत्र माता सीता का भी जन्मस्थान है।अपने पति के दीर्घ जीवन की मंगलकामना करने का सबसे विशिष्‍ट पर्व मधुश्रावणी मैथिल ललना की समर्पण एवं सहिष्‍णुता की कामना, निष्‍ठा एवं संस्कृति के प्रति प्रेम का प्रतीक है।मिथिलांचल का मधुश्रावणी जैसा लोकपर्व विश्व भर में अनूठा है। मिथिला समाज में मधुश्रावणी विधि - विधान के साथ मनाने की परंपरा है।मधुश्रावणी मुख्यतया मिथिलांचल के ब्राह्मण, कर्ण-कायस्थ और स्वर्णकार परिवार की नवविवाहिता मनाती है।पति की लंबी आयु की कामना के लिए चौदह दिवसीय यह पूजा सिर्फ मिथिला वासियों के बीच हीं होता है। यह पावन पर्व मिथिला की नवविवाहिता बहुत ही धूम-धाम के साथ दुल्हन के रूप में सजधज कर मनाती है।इस पर्व में मिट्टी की मूर्तियां, विषहरा, शिव-पार्वती बनाया जाता है। इस पूरे व्रत के दौरान गौरी-शंकर का विशेष पूजन महिलाएं करती हैं। साथ ही नवविवाहिताओं को शिवजी-पार्वती सहित मैना पंचमी, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, पतिव्रता, महादेव कथा, गौरी तपस्या, शिव विवाह, गंगा कथा, बिहुला कथा जैसे 14 खंडो की कथा सुनाई जाती है।इन कथा-कहानियों मे शंकर-पार्वती के चरित्र के माध्यम से पति-पत्नी के बीच होने वाली बाते जैसे नोक-झोंक, रूठना मनाना, प्यार, मनुहार जैसी बातों का भी जिक्र होता है ताकि नव दंपती इनसे सीखकर अपने जीवन को सुखमय बनायें। 

ससुराल से आए अन्न से तैयार होता है भोजन


मधुश्रावणी जीवन में सिर्फ एक बार शादी के पहले सावन को किया जाता है।मधुश्रावणी व्रत महिलाएं मायके में मनाती हैं। इस दौरान नवविवाहिता नमक नहीं खाती हैं और जमीन पर सोती हैं।यह पूजा लगातार 14 दिनों तक चलते हुए श्रावण मास के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि को विशेष पूजा-अर्चना के साथ व्रत की समाप्ति होती है।इन दिनों नवविवाहिता व्रत रखकर गणेश, चनाई, मिट्टी एवं गोबर से बने विषहारा एवं गौरी-शंकर का विशेष पूजा कर महिला पुरोहिताईन(गांव की ही बुजुर्ग महिलाएं) से कथा सुनती है। कथा का प्रारम्भ विषहरा के जन्म एवं राजा श्रीकर से होता है।



इस व्रत के द्वारा स्त्रियाँ अखण्ड सौभाग्यवती के साथ पति की दीर्घायु होने की कामना करती है। व्रत के प्रारम्भ दिनों में ही नवविवाहिता के ससुराल से पूरे 14 दिनों के व्रत के सामग्री तथा सूर्यास्त से पूर्व प्रतिदिन होने वाली भोजन सामग्री भी वहीं से आती है। शुरु व अन्तिम दिनों में व्रतियों द्वारा समाज व परिवार के लोगों में अंकुरी बाँटने की भी प्रथा देखने को मिलती है। प्रतिदिन पूजन के उपरान्त नवविवाहिता अपने सहेलियों के साथ गाँव के आसपास के मन्दिरों एवं बगीचों में फूल और पत्ते तोड़ती हुई व्रत का भरपूर आनन्द भी लेती है।




इस पूजन में संध्या के समय तोड़े गए फूल जो सूबह पूजन के कार्य में लिया जाता है इसका विशेष महत्व है क्योंकि पूजा के लिए रोजाना ताजे फूलों और पत्तों का ही इस्तेमाल किया जाता है।इसलिए संध्या के समय नवविवाहिता अपने सखी सहेलियों के साथ एक समूह बनाकर पूजन हेतु बांस के डाली में फूल तोड़ती हैं।इस बार 10 जूलाई से पूजा का प्रारंभ हुआ है जो की 22 जुलाई तक चलेगी। लगातार तेरह दिनों तक नवविवाहिता अपने ससुराल का अरवा भोजन प्राप्त करती हैं। तपस्या के समान यह पर्व पति की दीर्घायु के लिये हैं।

नवविवाहिता के ससुराल पक्ष से विधि विधान में कोई कसर नहीं होने देती हैं। पूजा के अंतिम दिन नवविवाहिता के ससुराल पक्ष से काफी मात्रा में पूजन की सामग्री, कई प्रकार के मिष्ठान ,नए वस्त्र के साथ पांच बुजुर्ग लोग आशीर्वाद देने के लिए पहुँचते हैं। नवविवाहिता ससुराल पक्ष के बुजुर्ग लोगों से आशीर्वाद पाकर हीं पूजा समाप्त करती हैं । मधुश्रावणी पूजा के अंतिम दिन कई विधि विधान तरीके से पूजन का कार्य किया जाता हैं। सुबह शाम महिलाएं समूह बनाकर घंटों गीत गाती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि लगातार तेरह दिनों तक पूजा स्थल पर नवविवाहिता की देख रेख में अखंड दीप प्रज्वलित रहती हैं। कथा वाचिका प्रत्येक दिन नवविवाहिता को मधुश्रावणी व्रत कथा सुनाती हैं। पूजा के समय नवविवाहिता नए वस्त्र में आभूषण से सुसज्जित होकर कथा श्रवण के साथ पूजा, अर्चना करती हैं।



मिथिला की पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार चलने वाले लोग देश-विदेश में इस व्रत को करते हैं।पूजन स्थल पर मैनी (पुरइन, कमल का पत्ता) के पत्ते पर विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनायी जाती है।महादेव, गौरी, नाग-नागिन की प्रतिमा स्थापित कर व विभिन्न प्रकार के नैवेद्य चढ़ा कर पूजन प्रारंभ होती है इस व्रत में विशेष रूप से महादेव, गौरी, विषहरी व नाग देवता की पूजा की जाती है।पूजन के सातवें, आठवें और नौवें दिन प्रसाद के रूप में खीर और रसगुल्ले का भोग भगवान को लगाया जाता है। इससे पहले मधुश्रावणी शुरू होने से एक दिन पहले नहाय खाय होता है इसके बाद ही नवविवाहिता महिलाएं अनुष्ठान की शुरुआत करती हैं।

प्रत्येक दिन अलग-अलग कथाओं में मैना पंचमी, विषहरी, बिहुला, मनसा, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, समुद्र मंथन, सती की कथा व्रती को सुनायी जाती है। प्रात:काल की पूजा में गोसांई गीत व पावनी गीत गाये जाती है तथा संध्या की पूजा में कोहबर तथा संझौती गीत गाये जाती है। व्रत के अंतिम दिन व्रती के ससुराल से मिठाई, कपड़े, गहने सहित अन्य सौगात भेजे जाते हैं।पूजा में भाई का भी याेगदान रहता है। प्रत्येक दिन पूजा समाप्ति के बाद भाई बहन काे हाथ पकड़कर उठाते हैं।मधुश्रावणी में अंतिम दिन टेमी दागने की भी प्राचीन परंपरा रही है। नवविवाहिताओं काे गर्म पान, सुपाड़ी एवं आरत पत्ता से हाथ एवं पांव काे दागा जाता है, इसे ही टेमी दागना कहते हैं ।इसके पीछे मान्यता है कि इससे पति-पत्नी का संबंध मजबूत रहता है। आज भी प्राचीन परंपरा बरकरार है। इस दाैरान महिलाएं समूह गीत गाती हैं।

पकवानों से सजती है डलिया 


पूजा के अंतिम दिन 14 छोटे बर्तनों में दही तथा फल-मिष्टान सजा कर पूजा किया जाता है। साथ ही 14 सुहागन महिलाओं के बीच प्रसाद का वितरण कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

अनोखा क्यों है यह पर्व 

  • ससुराल पक्ष से आए अन्न एवं वस्त्र का होता है प्रयोग। 
  • महिला पंडित संपन्न करवाती है पूजा। 
  • लोक कथाओं के माध्यम से दिया जाता है संदेश। 
  • व्यस्तता के बाद भी इसमे शामिल होते हैं पति महोदय। 
  • अंतिम दिन टेमी दागने और सिंदूरदान की है परम्परा।

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