Papankusha Ekadashi 2021 : कब है पापांकुशा एकादशी? जानें इसका महत्व, शुभ मुहूर्त व कथा, समस्त पापों का प्रायश्चित करने व सद्गति पाने के लिये पापांकुशा एकादशी का व्रत करें


एकादशी व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। पौराणिक ग्रंथों में इसके महत्व के बारे में काफी कुछ लिखा मिलता है। प्रत्येक मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशियों को मिलाकर एक वर्ष में 24 एकादशी व्रत आते हैं। प्रत्येक एकादशी अपने आप में विशेष महत्त्व रखती है क्योंकि हर एकादशी में अलग तरीके से व्रत व पूजन किया जाता है।सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है। अश्विन मास में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी तिथि को पापकुंशा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार पापकुंशा एकादशी 16 अक्टूबर दिन शनिवार को पड़ रही है। कई बार व्यक्ति के जीवन में ऐसा होता है कि वह लगातार पापकर्म किये जाता है और जब उसकी मति फिरती है तो उसे लगता है कि वह पाप के शिखर कर पंहुच चुका है यहां से तो उसे पश्चाताप करने का भी अधिकार नहीं है। लेकिन अगर उसके अंदर पश्चाताप की सच्ची भावना है तो उसके लिये अश्विन मास की शुक्ल एकादशी बहुत ही पुण्य फलदायी हो सकती है। आइये जानते हैं पापकुंशा एकादशी की व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

2021 में पापकुंशा एकादशी की तिथि व शुभ मुहूर्त




पापकुंशा एकादशी दशहरे के अगले दिन होती है। इस वर्ष अश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 16 अक्टूबर दिन शनिवार को पड़ेगी। इसलिए इसी दिन एकादशी का व्रत रखा जाएगा। 

अश्विन मास शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि आरंभ- 15 अक्टूबर 2021 दिन शुक्रवार को शाम 06 बजकर 02 मिनट से 

अश्विन मास शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि समाप्त- 16 अक्टूबर 2021 दिन शनिवार को शाम 05 बजकर 37 मिनट पर  

पारण के दिन द्वादशी तिथि समाप्ति समय- 17 अक्टूबर 2021 दिन रविवार को शाम  05 बजकर 39 मिनट पर 

एकदाशी व्रत पारण का समय- प्रातः 06 बजकर 23 मिनट से 08 बजकर 40 मिनट

चूंकि उदया तिथि में एकादशी 16 अक्टूबर को है इसलिए इसी दिन व्रत और विष्णु जी का पूजन फलदायी होगा। 

पापकुंशा एकादशी व्रत की पूजा विधि

  • एकादशी व्रत का पालन दशमी तिथि से ही आरंभ हो जाता है। दशमी तिथि को संभव हो तो एक समय ही भोजन करना चाहिये। भोजन भी सात्विक ग्रहण करना चाहिये। गेंहु, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल, मसूर दाल आदि का भोजन नहीं ग्रहण करना चाहिये। ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।
  • एकादशी तिथि को प्रात:काल उठकर स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करके व्रत का संकल्प लेना चाहिये। सामर्थ्य अनुसार एक समय फलाहार या निराहार उपवास का संकल्प कर सकते हैं।व्रत करने वाली यदि स्त्री हो तो वो इस बात का ध्यान रखें कि सिर से स्नान न करें।
  • संकल्प लेकर घट स्थापना करें। 
  • घट स्थापना करके उसके पास में आसन पर भगवान विष्णु की तस्वीर स्थापित करें।
  • अब धूप-दीप और फल, फूल आदि से भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन करें।
  • रात्रि में भगवान विष्णु के सहस्त्रनाम का पाठ करते हुए जागरण करना चाहिये।लोग इस दिन जागरण या निरन्तर मूल मंत्र का जाप करना उचित मानते हैं।गीता के अध्यायों का पाठ करें ।
  • भगवान विष्णु के मूल मंत्र
“ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः ।।” का जाप करें ।
  • मंत्र-
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
    हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
      इस मंत्र का का 108 बार जाप कर सकते हैं ।कहते हैं कि इस एक मंत्र के जाप से आपकी हर परेशानी का हल हो सकता है और इसका जाप तुलसी की माला पर किया जाता है।
      • एकदाशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि को किया जाता है।
      • द्वादशी तिथि को प्रातः जल्दी उठकर स्नानादि करने के पश्चात पूजन करें।
      • अब सात्विक भोजन बनाकर योग्य ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को करवाएं और दान दक्षिणा देकर उन्हें विदा करें। 
      • इसके बाद शुभ मुहूर्त  में आप भी व्रत का पारण करें। 

      इस प्रकार एकादशी तिथि के दिन पूरे विधि विधान से विष्णु पूजन करना विशेष रूप से फलदायी होता है और इससे सभी पापों से मुक्ति मिलती है।

      पापांकुशा एकादशी व्रत के नियम | Papankusha Ekadashi Vrat Ke Niyam

      पापांकुशा एकादशी पर भूल कर भी यह काम ना करें।

      • इस दिन स्त्रियाँ सिर से स्नान न करें। यानि बाल न धोयें।
      • भोजन में चावल का सेवन न करें।
      • व्रत करने वाला इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
      • मौन रखें अन्यथा कम बोलें, बिल्कुल भी क्रोध ना करें।
      • अपने आचरण पर नियंत्रण रखें।

      पापांकुशा एकादशी व्रत कथा! | Papankusha Ekadashi Vrat Katha


      धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे जगदीश्वर! मैंने आश्विन कृष्ण एकादशी अर्थात इंदिरा एकादशी का सविस्तार वर्णन सुना। अब आप कृपा करके मुझे आश्विन/क्वार माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के विषय में भी बतलाइये। इस एकादशी का क्या नाम है तथा इसके व्रत का क्या विधान है? इसका व्रत करने से किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया यह सब विधानपूर्वक कहिए।


      भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। हे राजन! इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्‍मनाभ की पूजा करनी चाहिए। यह एकादशी मनुष्य को मनोवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है।


      मनुष्य को बहुत दिनों तक कठोर तपस्या से जो फल मिलता है, वह फल भगवान गरुड़ध्वज को नमस्कार करने से प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य अज्ञानवश अनेक पाप करते हैं परंतु हरि को नमस्कार करते हैं, वे नरक में नहीं जाते। विष्णु के नाम के कीर्तन मात्र से संसार के सब तीर्थों के पुण्य का फल मिल जाता है। जो मनुष्य शार्ङ्‍ग धनुषधारी भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यम यातना भोगनी नहीं पड़ती।


      जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य नरकवासी होते हैं। सहस्रों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार में एकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके बराबर पवित्र तीनों लोकों में कुछ भी नहीं। इस एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक मनुष्य पद्‍मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक उनकी देह में पाप वास कर सकते हैं।


      पापांकुशा एकादशी की पौराणिक एवं प्रामाणिक व्रत कथा-


      इस व्रत की कथा के अनुसार प्राचीन समय में विंध्य पर्वत पर क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था, वह बड़ा क्रूर था। उसका सारा जीवन हिंसा, लूटपाट, मद्यपान और गलत संगति पाप कर्मों में बीता। जब उसका अंतिम समय आया तब यमराज के दूत बहेलिए को लेने आए और यमदूत ने बहेलिए से कहा कि कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है हम तुम्हें कल लेने आएंगे।


      यह बात सुनकर बहेलिया बहुत भयभीत हो गया और महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुंचा और महर्षि अंगिरा के चरणों पर गिरकर प्रार्थना करने लगा, हे ऋषिवर! मैंने जीवन भर पाप कर्म ही किए हैं। कृपा कर मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं, जिससे मेरे सारे पाप मिट जाएं और मोक्ष की प्राप्ति हो जाए। उसके निवेदन पर महर्षि अंगिरा ने उसे आश्विन शुक्ल की पापांकुशा एकादशी का विधिपूर्वक व्रत रखने के लिए कहा।


      महर्षि अंगिरा के कहे अनुसार उस बहेलिए ने यह व्रत किया और किए गए सारे पापों से छुटकारा पा लिया और इस व्रत इस व्रत के प्रभाव से उसके सभी संचित पाप नष्‍ट हो गए तथा उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई।


      पापाकुंशा एकादशी का महत्व


      हे राजेन्द्र! यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन को देने वाली है। एकादशी के व्रत के बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं। हरिवासर तथा एकादशी का व्रत करने और जागरण करने से सहज ही में मनुष्य विष्णु पद को प्राप्त होता है। हे युधिष्ठिर! इस व्रत के करने वाले दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार कर देते हैं। वे दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप हो, पीतांबर पहने और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को जाते हैं।


      हे नृपोत्तम! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी दुर्गति को प्राप्त न होकर सद्‍गति को प्राप्त होता है। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता।


      जो मनुष्य किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी की तरह सांस लेता हुआ निर्जीव के समान ही है। निर्धन मनुष्यों को भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धन वालों को सरोवर, बाग, मकान आदि बनवा कर दान करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्‍य, कुलीन और रोगरहित रहते हैं। इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है।


      पापाकुंशा एकादशी विशेष साधना 


      भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे राजन! जो आपने मुझसे मुझसे पूछा वह सब मैंने आपको बतलाया। अब आपकी और क्या सुनने की इच्छा है?

      यावत् जीवेत सुखं जीवेत |

      सर्वं पापं विनश्यति ||

      प्रत्येक जीव विभिन्न योनियों से होता हुआ निरन्तर गतिशील रहता है। हालांकि उसका बाहरी चोला बार-बार बदलता रहता है, परन्तु उसके अन्दर निवास करने वाली आत्मा शाश्वत है, वह मारती नहीं हैं, अपितु भिन्न-भिन्न शरीरों को धारण कर आगे के जीवन क्रम की ओर गतिशील रहती है।

      जो कार्य जीव द्वारा अपनी देह में होता है, उसे कर्म कहते हैं और उसके सामान्यतः दो भेद हैं - शुभ कर्म यानी कि पुण्य तथा अशुभ कर्म अर्थात पाप। शुभ कर्म या पुण्य वह होता है, जिसमें हम किसी को सुख देते हैं, किसी की भलाई करते हैं और अशुभ कर्म वह होता है, जिसमें हमारे द्वारा किसी को दुःख प्राप्त होता है, जिसमें हमारे द्वारा किसी को संताप पहुंचता हैं।

      मानव योनी ही एक ऐसे योनि है, जिसमें वह अन्य कर्मों को संचित करता रहता है। पशु आदि तो बस पूर्व कर्मों के अनुसार जन्म ले कर ही चलते रहते हैं, वे यह नहीं सोचते, कि यह कार्य मैं कर रहा हूं या मैं इसको मार रहा हूं। अतः उनके पूर्व कर्म तो क्षय होते रहते हैं, परन्तु नवीन कर्मों का निर्माण नहीं होता; जबकि मनुष्य हर बात में 'मैं' को ही सर्वोच्चता प्रदान करता हैं और चूंकि वह प्रत्येक कार्य का श्रेय खुद लेना चाहता है, अतः उसका परिणाम भी उसे ही भुगतना पड़ता है।

      मनुष्य जीवन और कर्म

      मनुष्य जीवन में कर्म को शास्त्रीय पद्धति में तीन भागों में बांटा गया है -

      १. संचित

      २. प्रारब्ध

      ३. आगामी (क्रियमाण)

      • 'संचित कर्म' वे होते हैं, जो जीव ने अपने समस्त दैहिक आयु के द्वारा अर्जित किये हैं और जो वह अभी भी करता जा रहा है।
      • 'प्रारब्ध' का अर्थ है, जिन कर्मों का फल अभी गतिशील हैं, उसे वर्त्तमान में भोगा जा रहा हैं।
      • 'आगामी' का अर्थ है, वे कर्म, जिनका फल अभी आना शेष है।

      इन तीनों कर्मों के अधीन मनुष्य अपना जीवन जीता रहता है। प्रकृति के द्वारा ऐसी व्यवस्था तो रहती है, कि उसके पूर्व कर्म संचित रहें, परन्तु दुर्भाग्य यह है, कि मनुष्य को उसके नवीन कर्म भी भोगने पड़ते हैं, फलस्वरूप उसे अनंत जन्म लेने पड़ते हैं। परन्तु यह तो एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है और इसमें तो अनेक जन्मों तक भटकते रहना पड़ता है।

      परन्तु एक तरीका है जिससे व्यक्ति अपने छल, दोष, पाप को समूल नष्ट कर सकता है, नष्ट ही नहीं कर सकता अपितु भविष्य के लिए अपने अन्दर अंकुश भी लगा सकता है, जिससे वह आगे के जीवन को पूर्ण पवित्रता युक्त जी सके, पूर्ण दिव्यता युक्त जी सके और जिससे उसे फिर से कर्मों के पाश में बंधने की आवश्यकता नहीं पड़े ।

      साधना : एकमात्र मार्ग

      यह तरीका यह मार्ग है साधना का, क्योंकि साधना का अर्थ ही है, कि अनिच्छित स्थितियों पर पूर्णतः विजय प्राप्त कर अपने जीवन को पूरी तरह साध लेना, इस पर पूरी तरह से अपना नियंत्रण कायम कर लेना ।

      यदि यह साधना तंत्र मार्ग के अनुसार हो, तो इससे श्रेष्ठ कुछ हो ही नहीं सकता, इससे उपयुक्त स्थिति तो और कोई हो ही नहीं सकती, क्योंकि स्वयं शिव ने 'महानिर्वाण तंत्र' में पार्वती को तंत्र की विशेषता के बारे में समझाते हुए बताया है -

      कल्किल्मष दीनानां द्विजातीनां सुरेश्वरी |

      मध्या मध्य विचाराणां न शुद्धिः श्रौत्कर्मणा ||

      न संहिताध्यैः स्र्मुतीभिरष्टसिद्धिर्नुणां भवेत् |

      सत्यं सत्यं पुनः सत्यं सत्य सत्यं मयोच्यते ||

      विनाह्यागम मार्गेण कलौ नास्ति गतिः प्रिये |

      श्रुतिस्मृतिपुराणादी मयैवोक्तं पूरा शिवे ||

      आगमोक्त विधानेन कलौ देवान्यजेत्सुधिः ||

      हे देवी! कलि दोष के कारण ब्राह्मण या दुसरे लोग, जो पाप-पुण्य का विचार करते हैं, वे वैदिक पूजन की विधियों से पापहीन नहीं हो सकते। मैं बार बार सत्य कहता हूँ, कि संहिता और स्मृतियों से उनकी आकांक्षा पूर्ण नहीं हो सकती। कलियुग में तंत्र मार्ग ही एकमात्र विकल्प है। यह सही है, कि वेद, पुराण, स्मृति आदि भी विश्व को किसी समय मैंने ही प्रदान किया था, परन्तु कलियुग में बुद्धिमान व्यक्ति तंत्र द्वारा ही साधना कर इच्छित लाभ पाएगा। 

      इससे स्पष्ट होता है, कि तंत्र साधना द्वारा व्यक्ति अपने पाप पूर्ण कर्मों को नष्ट कर, भविष्य के लिए उनसे बन्धन रहित हो सकते हैं। वैसे भी व्यक्ति यदि जीवन में पूर्ण दरिद्रता युक्त जीवन जी रहा है या यदि वह किसी घातक बीमारी के चपेट में है, जो कि समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रही हो, तो यह समझ लेना चाहिए, कि उसके पाप आगे आ रहे है ...

      नीचे कुछ स्थितियां हैं जिससे स्पष्ट होता हैं कि व्यक्ति के पूर्व पापों के कारण जीवन में प्रवेश करती हैं --

      1. घर में बार-बार कोई दुर्घटना होना, आग लगना, चोरी होना आदि |
      2. पुत्र या संतान का न होना, या होने पर तुरंत मर जाना |
      3. घर के सदस्यों की अकाल मृत्यु होना |
      4. जो भी योजना बनायें, उसमें हमेशा नुकसान होना |
      5. हमेशा शत्रुओं का भय होना|
      6. विवाह में अत्यंत विलम्ब होना या घर में कलह पूर्ण वातावरण, तनाव आदि|
      7. हमेशा पैसे की तंगी होना, दरिद्रतापूर्ण जीवन, बीमारी और अदालती मुकदमों में पैसा पानी की तरह बहना|

      ये कुछ स्थितियां हैं, जिनमें व्यक्ति जी-जान से कोशिश करने के उपरांत भी यदि उन पर नियंत्रण नहीं प्राप्त कर पाता, तो समझ लेना चाहिए, कि यह पूर्व जन्म कर्मों के दोष के कारण ही घटित हो रहा है। इसके लिये फिर उन्हें साधना का मार्ग अपनाना चाहिए, जिसके द्वारा उसके समस्त दोष नष्ट हो सकें और वह जीवन में सभी प्रकार से वैभव, शान्ति और श्रेष्ठता प्राप्त कर सके। 

      पापांकुशा साधना

      ऐसी ही एक साधना है पापांकुशा साधना, जिसके द्वारा व्यक्ति अपने जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के दोषों को - चाहे वह दरिद्रता हो, अकाल मृत्यु हो, बीमारी हो या चाहे और कुछ हो, उसे पूर्णतः समाप्त कर सकता है और अब तक के संचित पाप कर्मों को पूर्णतः नष्ट करता हुआ भविष्य के लिए भी उनके पाश से मुक्त हो जाता है, उन पर अंकुश लगा पाता है |

      इस साधना को संपन्न करने से व्यक्ति के जीवन में यदि ऊपर बताई गई स्थितियां होती है, तो वे स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं| वह फिर दिनों-दिन उन्नति की ओर अग्रसर होने लग जाता है, इच्छित क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है और फिर कभी भी, किसी भी प्रकार की बाधा का सामना उसे अपने जीवन में नहीं करना पड़ता। 

      यह साधना अत्याधिक उच्चकोटि की है और बहुत ही तीक्ष्ण है। चूंकि यह तंत्र साधना है, अतः इसका प्रभाव शीघ्र देखने को मिलता है। यह साधना स्वयं ब्रह्म ह्त्या के दोष से मुक्त होने के लिए एवं जनमानस में आदर्श स्थापित करने के लिए कालभैरव ने भी संपन्न की थी। इसी से साधना की दिव्यता और तेजस्विता का अनुमान हो जाता है ....

      यह साधना तीन दिवसीय है, इसे पापांकुशा एकादशी से या किसी भी एकादशी से प्रारम्भ करना चाहिए। इसके लिए 'समस्त पाप-दोष निवारण यंत्र' तथा 'हकीक माला' की आवश्यकता होती है। 

      सर्वप्रथम साधक को ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान आदि से निवृत्त हो कर, सफेद धोती धारण कर, पूर्व दिशा की ओर मुँह कर बैठना चाहिए और अपने सामने नए श्वेत वस्त्र से ढके स्थान पर 'समस्त पाप-दोष निवारण यंत्र' स्थापित कर उसका पंचोपचार पूजन संपन्न करना चाहिए। 'मैं अपने सभी पाप-दोष समर्पित करता हूं, कृपया मुझे मुक्ति दें और जीवन में सुख, लाभ, संतुष्टि प्रसन्नता आदि प्रदान करें' - ऐसा कहने के साथ यदि अन्य कोई इच्छा विशेष हो, तो उसका भी उच्चारण कर देना चाहिए| फिर 'हकीक' से निम्न मंत्र का २१ माला मंत्र जप करना चाहिए -

      || ॐ क्लीं ऐं पापानि शमय नाशय ॐ फट ||

      | ॐ सर्व पापनाशय ह्रों हीं नम : |

      यह मंत्र अत्याधिक चैत्यन्य है और साधना काल में ही साधक को अपने शरीर का ताप बदला मालूम होगा| परन्तु भयभीत न हों, क्योंकि यह तो शरीर में उत्पन्न दिव्याग्नी है, जिसके द्वारा पाप राशि भस्मीभूत हो रही है। साधना समाप्ति के पश्चात साधक को ऐसा प्रतीत होगा, कि उसका सारा शरीर किसी बहुत बोझ से मुक्त हो गया है, स्वयं को वह पूर्ण प्रसन्न एवं आनन्दित महसूस करेगा और उसका शरीर फूल की भांति हल्का महसूस होगा। 

      जो साधक अध्यात्म के पथ पर आगे बढ़ना चाहते हैं, उन्हें तो यह साधना अवश्य ही संपन्न करने चाहिए, क्योंकि जब तक पाप कर्मों का क्षय नहीं हो जाता, व्यक्ति की कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो ही नहीं सकती और न ही वह समाधि अवस्था को प्राप्त कर सकता है। 

      साधना के उपरांत यंत्र तथा माला को किसी जलाशय में अर्पित कर देना चाहिए। ऐसा करने से साधना फलीभूत होती है और व्यक्ति समस्त दोषों से मुक्त होता हुआ पूर्ण सफलता अर्जित कर, भौतिक एवं अध्यात्मिक, दोनों मार्गों में श्रेष्टता प्राप्त करता है। इसलिए साधक को यह साधना बार बार संपन्न करनी है, जब तक कि उसे अपने कार्यों में इच्छित सफलता मिल न पाये। 

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