माँ महागौरी – माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति की पावन कथा,शुभ मुहूर्त, महत्व ,पूजा विधि, मंत्र,आरती और फल प्राप्ति "सोमचक्र"

माँ महागौरी – माँ दुर्गा की आठवीं शक्ति 


माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों के सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।यह दिन हमारे शरीर का "सोमचक्र" जागृत करने का दिन है। सोमचक्र उध्र्व ललाट में स्थित होता है। मां की आराधना से सोमचक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां श्रद्धालु को प्राप्त हो जाती है।

आठवां (महाअष्टमी)शारदीय नवरात्र 2021 तिथि | Eighth Shardiya Navratri 2021 Date :-


यह तिथि अश्विन मास शुक्ल पक्ष अर्थात 12 अक्टूबर 2021 दिन मंगलवार को रात 09 बजकर 47 मिनट से प्रारंभ होकर 13 अक्टूबर 2021 दिन बुधवार को रात 08 बजकर 07 मिनट पर समाप्त होगी। अत: अष्टमी का पूजन 13 अक्टूबर 2021, दिन बुधवार को किया जाएगा। इस दिन महगौरी माता का पूजन किया जाएगा।

अष्टमी तिथि प्रारंभ - 12 अक्टूबर 2021 को रात 09 बजकर 47 मिनट से
अष्टमी तिथि समाप्त -13 अक्टूबर 2021 को रात 08 बजकर 07 मिनट पर 

आठवां शारदीय नवरात्र 2021 पूजा शुभ मुहूर्त | Eighth Shardiya Navratri 2021 Subh Muhurat :-



अमृत काल- सुबह 03 बजकर 23 मिनट से सुबह 04 बजकर 56 मिनट। 

दिन का चौघड़िया :

लाभ – सुबह 06 बजकर 26 मिनट से शाम 07 बजकर 53 मिनट तक।

अमृत – सुबह 07 बजकर 53 मिनट से शाम 09 बजकर 20 मिनट तक।

शुभ – सुबह 10 बजकर 46 मिनट से दोपहर 1 बजकर 13 मिनट तक।

लाभ – शाम 04 बजकर 32 मिनट से 05 बजकर 59 मिनट तक।

रात का चौघड़िया :

शुभ – शाम 07 बजकर 32 मिनट से रात 09 बजकर 06 मिनट तक।

अमृत – रात 09 बजकर 06 मिनट  से 10 बजकर 39 मिनट तक।

लाभ (काल रात्रि) – शाम 03 बजकर 20 मिनट से शाम 04 बजकर 53 मिनट तक।

नोट : स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथियों और मुहूर्त के समय में थोड़ी-बहुत घट-बढ़ होती है।

माँ महागौरी का स्वरूप | Maa Mahagauri Ka Swaroop:-



इनका वर्ण पूर्णतः गौर है। इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी।' इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं।

महागौरी की चार भुजाएँ हैं। इनका वाहन वृषभ है। इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है। ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं। इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है।

माँ महागौरी का महत्व | Maa Mahagauri ki Puja Ka Mahatva:-


माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है। हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए।महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती हैं। इनकी उपासना से आर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। अतः इनके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए।ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मां महागौरी का संबंध राहु ग्रह से है। इनकी पूजा अर्चना करने से कुंडली में राहु की स्थिति मजबूत होती है।विधिपूर्वक उनका स्मरण व पूजन करने से व्यापार, दांपत्य जीवन, सुख-समृद्धि, धन आदि में वृद्धि होती है। ऐसे लोग जो अभिनय, गायन, नृत्य आदि के क्षेत्र में हैं उन्हें देवी की पूजा से विशेष सफलता मिलती है। यह माना जाता है कि उनकी पूजा से त्वचा संबंधी रोगों का निवारण होता है।  

माँ महागौरी की पूजा विधि | Maa Mahagauri Ki Puja Vidhi:-


महागौरी की पूजा करने का बेहद सरल उपाय (विधान) है। सबसे पहले लकड़ी की चौकी पर या मंदिर में महागौरी की मूर्ति अथवा तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद चौकी पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर महागौरी यंत्र रखें तथा यंत्र की स्थापना करें। मां सौंदर्य प्रदान करने वाली हैं। हाथ में श्वेत पुष्प लेकर मां का ध्यान करें।ध्यान के बाद मां के श्री चरणों में पुष्प अर्पित करें (देवी महागौरी के पूजन में चमेली व केसर का फूल मां को चढ़ाया जाता हैं ।)तथा यंत्र सहित मां भगवती का पंचोपचार विधि से अथवा षोडशोपचार विधि से पूजन करें ।मां शक्ति के इस स्वरूप की पूजा में नारियल, हलवा, पूड़ी और सब्जी का भोग लगाया जाता है। आज के दिन काले चने का प्रसाद विशेष रूप से बनाया जाता है। तत्पश्चात् ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। मंत्र की तथा साथ में ॐ महा गौरी देव्यै नम: मंत्र की इक्कीस माला जाप करें, दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करे तथा मनोकामना पूर्ति के लिए मां से प्रार्थना करें। अंत में मां की आरती और कीर्तन करें।

अष्टमी के दिन कन्या पूजन विधि-



अष्टमी के दिन कन्या पूजन करना श्रेष्ठ माना जाता है। कन्या पूजन के दौरान नौ कन्‍याओं और एक बालक को घर पर आमंत्रित करें। उन्‍हें खाना खिलाएं और जय माता दी के जयकारे लगाएं।कन्‍याओं और बाल को यथाशक्ति भेंट और उपहार दें।अब उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लें और उन्‍हें विदा करें।

अन्यथा दो ही कन्याओं का पूजन करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कन्या पूजन करते समय कन्याओं की आयु 2 साल से ऊपर और 10 साल से अधिक नहीं होनी चाहिए। कन्या पूजन के बाद उन्हें भोजन करवाकर दक्षिणा भी देनी चाहिए।

पुराण के अनुसार इनके ध्यान और मंत्र इस प्रकार हैं...

मंत्राक्षरमयीं लक्ष्मीं मातृणां रूपधारिणीम्। नवदुर्गात्मिकां साक्षात् कन्यामावाहयाम्यहम्।।
जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरुपिणि । पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोस्तु ते।।

!! कुमार्य्यै नम:, त्रिमूर्त्यै नम:, कल्याण्यै नमं:, रोहिण्यै नम:, कालिकायै नम:, चण्डिकायै नम:, शाम्भव्यै नम:, दुगायै नम:, सुभद्रायै नम: !!

माँ महागौरी की कथा:-


पहली कथा- माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं। जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं। इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं। पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं।


दूसरी कथा- इस कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है। देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा। महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं। देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”। 

महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं। देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया। इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया। देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी। इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं।


श्लोक:-

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः । महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।।

अर्थ - मां दुर्गा का आठवां स्वरूप है महागौरी का। देवी महागौरी का अत्यंत गौर वर्ण हैं। इनके वस्त्र और आभूषण आदि भी सफेद ही हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। महागौरी का वाहन बैल है। देवी के दाहिने ओर के ऊपर वाले हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले हाथ में त्रिशूल है। बाएं ओर के ऊपर वाले हाथ में डमरू और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है। इनका स्वभाव अति शांत है।

महागौरी के मंत्र :

पुराणों में माँ महागौरी की महिमा का प्रचुर आख्यान किया गया है। ये मनुष्य की वृत्तियों को सत् ‌ की ओर प्रेरित करके असत्‌ का विनाश करती हैं। हमें प्रपत्तिभाव से सदैव इनका शरणागत बनना चाहिए।

1.ॐ देवी महागौर्यै नमः॥



2.या देवी सर्वभू‍तेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और माँ गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। हे माँ, मुझे सुख-समृद्धि प्रदान करो।

माता महागौरी की धयान :


वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥

पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥



महागौरी की स्तोत्र पाठ : 


सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

माता महागौरी की कवच :


ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥

ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥


माँ महागौरी की आरती | Maa Mahagauri Aarti):-


जय महागौरी जगत की माया ।

जया उमा भवानी जय महामाया ।।

हरिद्वार कनखल के पासा ।

महागौरी तेरा वहां निवासा ।।

चंद्रकली ओर ममता अंबे ।

जय शक्ति जय जय मां जगदंबे ।।

भीमा देवी विमला माता ।

कौशिकी देवी जग विख्याता ।।

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा ।

महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा ।।

सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया ।

उसी धुएं ने रूप काली बनाया ।।

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया ।

तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया ।।

तभी मां ने महागौरी नाम पाया ।

शरण आनेवाले का संकट मिटाया ।।

शनिवार को तेरी पूजा जो करता ।

मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता ।।

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो ।

महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो ।।

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