Amla Navami 2021: कब है आंवला नवमी पर्व? इस दिन आंवले की पेड़ की पूजा का है विशेष महत्व, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, महत्व और कथा



अक्षय नवमी को हिंदू संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठानों में से एक माना जाता है। इस उत्सव को हिंदू कैलेंडर के अनुसार कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के नौवें दिन (नवमी तिथि) मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह या तो अक्टूबर या नवंबर के महीने में आता है।इस वर्ष 12 नवंबर 2021 को मनाई जाएगी। पर्यवेक्षकों को अक्षय नवमी के दिन किए गए किसी भी तरह के धर्मार्थ कार्यों का लाभ उनके वर्तमान और साथ ही अगले जन्म में भी मिलता है। यह देव उठनी एकादशी के उत्सव से दो दिन पहले मनाया जाता है।यह पर्व मुख्यरूप से भारत के उत्तर और मध्य में मनाया जाता है। 

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि सत्ययुग काल अक्षय नवमी के दिन से शुरू हुआ था और इसलिए इस विशेष दिन को ‘सत्य युगाडी’ भी कहा जाता है। यह अक्षय तृतीया के समान है इस दिन त्रेता युग शुरू हुआ अतः इसे त्रेता युगाडी के नाम से जाना जाता है। विभिन्न तरह के दान पुण्य के कार्य करने के लिए, इस दिन को अत्यधिक शुभ और अनुकूल माना जाता है।

देश के कई हिस्सों में, इस दिन को ‘आंवला नवमी’ के रूप में मनाया जाता है क्योंकि आंवला के पेड़ में कई देवियों और देवताओं का निवास माना जाता है और इसलिए भक्तों द्वारा इसकी पूजा की जाती है। पश्चिम बंगाल के क्षेत्रों में, इस विशेष दिन को ‘जगधात्री पूजा’ के रूप में मनाया जाता है जहां भक्त अत्यधिक श्रद्धा के साथ सत्ता की देवी जगधात्री की पूजा करते हैं।

जो भक्त इस दिन मथुरा-वृंदावन की परिक्रमा करते हैं उन्हें समृद्धि और खुशीयों का आशीर्वाद मिलता है। कई तरह के लाभ पाने के लिए, विभिन्न वर्गों के बहुत से भक्त इकट्ठे होते हैं और ये अनुष्ठान करते हैं।

आचार्य चरक ने आंवला के गुणों को बताया। आयुर्वेद के अनुसार आंवला एक अमृत फल है, जो कई रोगों का नाश करने में सफल है और इसको पौराणिक दृष्टिकोण से रत्न जितना महत्व दिया जाता है। आंवला एक ऐसा फल है जिससे कोई नुकसान नहीं है और इस फल को नौजवानी का फल भी कहते हैं। इसके सेवन से बुढ़ापा नहीं आता है, यह विटामिन सी से भरपूर फल है। आंवला के सेवन से बाल लंबे और घने होते हैं और यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देता है। यह स्किन को चमकदार और सुंदर बनाता है। अक्षय नवमी के दिन आवंले के पेड़ की सफाई करनी चाहिए। साथ ही पेड़ पर दूध एवं फल चढ़ाना चाहिए। इसके बाद पुष्प अर्पित करना चाहिए और धूप, दीप दिखा कर और नैवेद्य़ चढ़ाना चाहिए। 

आंवले की उत्पत्ति



धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब पूरी पृथ्वी जलमग्न थी और इस पर जिंदगी नहीं थी, तब ब्रम्हा जी कमल पुष्प में बैठकर परब्रम्हा की तपस्या कर रहे थे। वह अपनी कठिन तपस्या में लीन थे। तपस्या के करते-करते ब्रम्हा जी की आंखों से ईश-प्रेम के अनुराग के आंसू टपकने लगे थे। ब्रम्हा जी के इन्हीं आंसूओं से आंवला का पेड़ उत्पन्न हुआ, जिससे इस चमत्कारी औषधीय फल की प्राप्ति हुई। इस तरह आंवला वृक्ष सृष्टि में आया और यह एक लाभकारी फल हुआ।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आंवले की उत्पत्ति परमपिता ब्रह्मा जी के आंसू की बूंदों से हुई है। आंवले को विश्व की शुरुआत का पहला फल मानकर पूजा की जाती है।

अक्षय नवमी का महत्व

हिंदू धर्म में, अक्षय नवमी के उत्सव को अत्यधिक शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह अत्यंत समर्पण और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन भजन उपासना के द्वारा, भक्त अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं और साथ ही मोक्ष प्राप्त करते हैं। इस दिन दान और भिक्षा देना बेहद शुभ माना जाता है। इस विशेष दिन को ‘कुष्मंद नवमी’ के रूप में भी पहचाना जाता है क्योंकि भगवान विष्णु ने इस दिन दानव ‘कुष्मंड’ का वध किया था और ब्रह्मांड में धर्म को बहाल किया था।

धर्मग्रंथों के अनुसार, आंवला नवमी के दिन आंवले के पेड़ पर भगवान विष्णु एवं शिवजी वास करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन अच्छे कार्य करने से कई जन्मों तक इसका पुण्य फल मिलता रहता है।

माना जाता है जो लोग अक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड़ की पूजा करते हैं उन्हें असीम शांति मिलती है और जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। 

जो महिलाएं श्रद्धापूर्वक इस नवमी की पूजा करती हैं उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति होती है और दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 
इस दिन पूजन करने से दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है और नवमी के दिन आंवले का सेवन करने से आपको कभी गैस की दिक्कत नहीं होती है।

मान्यता है कि अक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करने से यदि आपकी थाली में आंवला या उसका पत्ता गिर जाए तो काफी शुभ माना जाता है और संकेत मिलता  है कि आप सालभर स्वस्थ्य रहेंगे।

आंवला नवमी 2021 कब है?

आंवला नवमी इस साल 12 नवंबर, शुक्रवार को मनायी जा रही है।

आंवला नवमी 2021 शुभ मुहूर्त

12 नवंबर 2021 दिन शुक्रवार को सुबह 06 बजकर 50 मिनट से दोपहर 12 बजकर 10 मिनट तक पूजन का शुभ मुहूर्त है।

नवमी तिथि प्रारंभ-

12 नवंबर 2021, दिन शुक्रवार को सुबह 05 बजकर 51 मिनट से प्रारंभ होगी, जो कि 13 नवंबर, शनिवार को सुबह 05 बजकर 30 मिनट तक रहेगी।

अक्षय नवमी पूजन सामग्री 



  • आंवले का पौधा, पत्ते एवं फल, तुलसी के पत्ते एवं पौधा
  • कलश और जल
  • कुमकुम, हल्दी, सिंदूर, अबीर, गुलाल, चावल, नारियल, सूत का धागा 
  • धूप, दीप और नैवेद्य
  • ऋंगार का सामान, साड़ी-ब्लाउज और दान के लिए अनाज

अक्षय नवमी पूजन विधि



  • अक्षय नवमी के दिन प्रातकाल स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके महिलाओं को आंवला के पेड़ की पूजा करनी चाहिए। 
  • इस दिन हो सके तो पूरे परिवार को आंवला के पेड़ के नीचे बैठकर भोजन करना चाहिए। 
  • यदि आपके घर के आसपास आंवले का पेड़ नहीं है तो आप आंवले के छोटे पौधे के पास ही पूजा कर सकते हैं और फिर भोजन कर सकते हैं।
  • अक्षय नवमी के दिन आंवले के पेड़ की पूजा करना और उसकी परिक्रमा करने का विशेष प्रावधान है।
  • इस दिन महिलाएं वृक्ष का दूध से अभिषेक करती हैं और पूरे विधि-विधान से पूजन करती हैं। 
  • ऋंगार का सामान, कपड़े किसी गरीब या ब्राह्मण को दान करती हैं। 
  • नवमी के दिन आंवले के पेड़ पर सफेद या लाल मौली के धागे को लेकर महिलाएं 8 या 108 बार परिक्रमा करें। इस परिक्रमा के बाद महिलाएं ऋंगार का सामान, कुमकुम, हल्दी, सिंदूर, अबीर, गुलाल, चावल, नारियल आदि वस्तुओं को आवंले के पेड़ पर चढ़ाएं।
  • इसके बाद आंवले के पेड़ से ऋंगार का सामान लेकर सुहागिन को दान में दें।
  • आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर व्रतकथा सुनें और तत्पश्चात परिवार संग बैठकर भोजन करें। 

आंवला नवमी प्रथम कथा 



आंवला नवमी के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, तथा आंवले के पेड़ के नीचे भोजन करने की परंपरा शुरू हुई है। इस संदर्भ में एक कहानी है कि..

एक बार देवी लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करने आईं। रास्ते में उन्होंने भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करने की कामना की। लक्ष्मी माँ ने माना कि विष्णु और शिव को एक साथ कैसे पूजा जा सकता है। तब उन्होंने महसूस किया कि तुलसी और बेल की गुणवत्ता एक साथ आंवले के पेड़ में ही पाई जाती है। तुलसी को भगवान विष्णु से प्रेम है और भगवान शिव को बेल पत्र से।माता लक्ष्मी ने आंवले के पेड़ को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर आंवले के पेड़ की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के पेड़ के नीचे भोजन तैयार किया और उसे श्री विष्णु और भगवान शिव को परोसा। इसके बाद उन्होने उसी भोजन को प्रसाद रूप मे स्वयं ग्रहण किया। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी तिथि थी। अतः यह परंपरा उस समय से चली आ रही है।

अक्षय नवमी द्वितीय कथा

बहुत समय पहले काशी में एक व्यापारी और उसकी पत्नी रहती थी। व्यापारी की पत्नी काफी परेशान रहती थी क्योंकि उसके कोई संतान नहीं थी। एक दिन उसे किसी ने बताया कि अगर वह संतानप्राप्ति करना चाहती है तो उसे किसी जीवित बच्चे की बलि भैरव बाबा को चढ़ानी होगी। व्यापारी की पत्नी ने यह बात अपने पति को बताई परंतु व्यापारी ने अपनी पत्नी को इस तरह का कृत्य करने से मना कर दिया। लेकिन व्यापारी की पत्नी के मन से संतान प्राप्ति की लालसा कम नहीं हो पाई जिसकी वजह से उसने अपने पति से छिपकर और हत्या की परवाह किए बिना ही एक बच्चे को चुराया और उसकी बलि दे दी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि व्यापारी की पत्नी कई रोगों से ग्रस्त हो गई। पत्नी की यह हालत देख व्यापारी काफी दुखी हुआ, लेकिन जब उसने इसका कारण पूछा तो पत्नी ने पूरी घटना के बारे में बता दिया। यह सुनकर व्यापारी काफी क्रोधित हुआ परंतु पत्नी की स्थिति देखकर वह काफी व्यथित था। व्यापारी ने अपनी पत्नी को निरोगी होने का उपाय बताया। उसने कहा कि यदि तुम पाप से मुक्ति पाना चाहती हो तो कार्तिक मास में गंगा स्नान करें और सच्चे मन से ईश्वर की प्रार्थना करें। व्यापारी की बात सुनकर पत्नी ने नियमबद्ध तरीके से पति की बात का पालन किया। 

व्यापारी की पत्नी से प्रसन्न होकर मां गंगा ने एक बूढ़ी औरत के रूप में दर्शन दिए और कहा कि यदि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन वह वृंदावन में आंवले के पेड़ के नीचे जाकर विधि पूर्वक पूजन करें तो वह पाप से मुक्ति पा सकती है। मां गंगा की सलाह मानकर व्यापारी की पत्नी ने विधि विधान से आंवला नवमी का व्रत किया, इससे शीघ्र ही उसके सभी कष्ट दूर हो गए और उसे स्वस्थ संतान की प्राप्ति हुई। 

आंवला नवमी और शंकराचार्य की कथा



एक कथा के अनुसार एक बार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य भिक्षा मांगने एक कुटिया के सामने रुके। वहां एक बूढ़ी औरत रहती थी, जो अत्यंत गरीबी और दयनीय स्थिति में थी। शंकराचार्य की आवाज सुनकर वह बूढ़ी औरत बाहर आई। उसके हाथ में एक सूखा आंवला था। वह बोली महात्मन मेरे पास इस सूखे आंवले के सिवाय कुछ नहीं है जो आपको भिक्षा में दे सकूं।

शंकराचार्य को उसकी स्थिति पर दया आ गई और उन्होंने उसी समय उसकी मदद करने का प्रण लिया। उन्होंने अपनी आंखें बंद की और मंत्र रूपी 22 श्लोक बोले। ये 22 श्लोक कनकधारा स्तोत्र के श्लोक थे।

मां लक्ष्मी ने दिव्य दर्शन दिए इससे प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उन्हें दिव्य दर्शन दिए और कहा कि शंकराचार्य, इस औरत ने अपने पूर्व जन्म में कोई भी वस्तु दान नहीं की। यह अत्यंत कंजूस थी और मजबूरीवश कभी किसी को कुछ देना ही पड़ जाए तो यह बुरे मन से दान करती थी। इसलिए इस जन्म में इसकी यह हालत हुई है। यह अपने कर्मों का फल भोग रही है इसलिए मैं इसकी कोई सहायता नहीं कर सकती।
शंकराचार्य ने देवी लक्ष्मी की बात सुनकर कहा- हे महालक्ष्मी इसने पूर्व जन्म में अवश्य दान-धर्म नहीं किया है, लेकिन इस जन्म में इसने पूर्ण श्रद्धा से मुझे यह सूखा आंवला भेंट किया है। इसके घर में कुछ नहीं होते हुए भी इसने यह मुझे सौंप दिया। इस समय इसके पास यही सबसे बड़ी पूंजी है, क्या इतना भेंट करना पर्याप्त नहीं है। शंकराचार्य की इस बात से देवी लक्ष्मी प्रसन्न हुई और उसी समय उन्होंने गरीब महिला की कुटिया में स्वर्ण के आंवलों की वर्षा कर दी।


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