Pitri Paksha 2021: पितृ पक्ष तिथि, नियम, विधि, भोजन, महत्व और कथा श्राद्ध में इन बातों का रखें विशेष ध्यान

 



हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज़, व्रत-त्यौहार व परंपराएं मौजूद हैं। हिंदूओं में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक अनेक प्रकार के संस्कार किये जाते हैं।अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। इस साल 20 सितंबर 2021 से 16 दिवसीय महालय श्राद्ध पक्ष शुरु हो रहा है और 06 अक्टूबर 2021 को समाप्त होगा।। इस समय ग्रहों के पिता सूर्य कन्या राशि में गोचर करेंगे। इस दौरान चांद धरती के काफी करीब आ जाता है और चांद के ऊपर पितृलोक माना गया है। कहा जाता है कि श्राद्धपक्ष के दौरान हमारे पितर सूर्य रश्मियों पर सवार होकर धरती पर अपने परिजनों के यहां आते हैं और शुक्ल प्रतिपदा को वापस अपने पितृलोक लौट जाते हैं। पितृपक्ष के दौरान पिंडदान, तर्पण और ब्राह्मण को भोजन कराने से पूर्वज प्रसन्न हो जाते हैं और अपने पुत्र-पौत्रों को आशीर्वाद देते हैं इसलिये अपने पूर्वज़ों को के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।

पितृ पक्ष का महत्व:-


पौराणिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। इसके पिछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। शास्त्रों में पितृ दोष काफी अहम माना जाता है।

श्राद्धकर्म-शास्त्र में उल्लिखित है-“श्राद्धम न कुरूते मोहात तस्य रक्तम पिबन्ति ते।” अर्थात् मृत प्राणी बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे-सम्बंधियों का रक्त-पान करते हैं। 

उपनिषद में भी श्राद्धकर्म के महत्व पर प्रमाण मिलता है- “देवपितृकार्याभ्याम न प्रमदितव्यम ...।” अर्थात् देवता एवं पितरों के कार्यों में प्रमाद (आलस्य) मनुष्य को कदापि नहीं करना चाहिए।

वायुपुराण में कहा गया है कि 'ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुरुः अंगनागमः, पापं तत्संगजं सर्वं गयाश्राद्धाद्विनश्यतिअर्थात- गया में श्राद्ध करने से ब्रह्महत्या, सुरापान, स्वर्ण की चोरी, गुरुपत्नीगमन और उक्त संसर्गजनित महापातक सभी महापातक नष्ट हो जाते हैं।

गरुण पुराण के अनुसार मनुष्य की मुक्ति के चार मार्ग, ब्रह्म ज्ञान, गया में श्राद्ध, कुरुक्षेत्र में निवास तथा गौशाला में मृत्यु है। जो मनुष्य अपने घर से गया के लिए प्रस्थान करते हैं, गया पहुँचने तक उनका प्रत्येक कदम पितरों के स्वर्गारोहण के लिए सीढ़ी बनता जाता है। पितृपक्ष में गयातीर्थ में जाकर हम पितरों का श्राद्ध-तर्पण करके पितृऋण से मुक्ति पा सकते हैं क्योंकि स्वयं भगवान् विष्णु पितृ देवता के रूप में गयातीर्थ में निवास करते हैं।


कौन होते हैं पितर ?


परिवार के दिवंगत सदस्य चाहे वह विवाहित हों या अविवाहित, बुजूर्ग हों या बच्चे, महिला हों या पुरुष जो भी अपना शरीर छोड़ चुके होते हैं उन्हें पितर कहा जाता है। मान्यता है कि यदि पितरों की आत्मा को शांति मिलती है तो घर में भी सुख शांति बनी रहती है और पितर बिगड़ते कामों को बनाने में आपकी मदद करते हैं लेकिन यदि आप उनकी अनदेखी करते हैं तो फिर पितर भी आपके खिलाफ हो जाते हैं और लाख कोशिशों के बाद भी आपके बनते हुए काम बिगड़ने लग जाते हैं।


पितृपक्ष की शुरुआत :-


श्रीकृष्ण भगवान ने कहा है कि आत्मा कभी मरती नहीं, ये बस एक शरीर से दूसरे शरीर में बदलती है। इसलिये आप अपने पूर्वजों को जब भी कुछ अर्पित करते हो तो वो उन्हें मिलता है।हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध (दान) करने की परंपरा को कर्ण के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। कर्ण एक धर्मार्थ राजा था और जरूरतमंदों और दलितों की मदद करने के लिए कर्ण ने जीवन भर सोने और अन्य कीमती चीजों का दान किया था। जब वह मर गए, तो उनकी आत्मा स्वर्ग चली गई, जहाँ उन्हें खाने के लिए सोना और गहने दिए जाते थे। दुखी होकर वह उसी का कारण जानने के लिए इंद्र के पास गए। इंद्र ने उन्हें बताया कि अपने जीवन के दौरान कई चीजों, विशेष रूप से सोने का दान करने के बावजूद, उन्होंने कभी भी अपने पूर्वजों को ना ही भोजन कराया और ना ही उनकी सेवा की, जिसकी वजह से उन्हें यह सजा मिल रही है। कर्ण ने तर्क दिया कि चूंकि उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्होंने कभी कुछ दान नहीं किया। अतः इंद्र ने कर्ण को श्राद्ध करने और पितृदोष से मुक्ति के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी।इस सबके बाद कर्ण को 16 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, जहां उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनका श्राद्ध कर उन्हें आहार दान किया। तर्पण किया, इन्हीं 16 दिन की अवधि को पितृ पक्ष कहा गया।


कब है पितृ पक्ष ?


हिंदू पंचांग के अनुसार पितृ पक्ष अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ते हैं। इनकी शुरुआत पूर्णिमा तिथि से होती है और समापन अमावस्या पर होता है। अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक हर साल सितंबर के महीने में पितृ पक्ष की शुरुआत होती है। आमतौर पर पितृ पक्ष 16 दिनों का होता है।इस साल पितृ पक्ष 20 सितंबर 2021  से शुरू हो कर 06 अक्टूबर 2021 को खत्म होगा। 

वैदिक ज्योतिष के हिसाब से, जिस दिन कन्या राशि में सूर्य प्रवेश करते हैं, उसी दौरान पितृ-पक्ष मनाये जाने की मान्यता होती है। कुंडली का पंचम भाव इंसान के पूर्व जन्म में किये गए कामों को दर्शाता है। इसके अलावा काल पुरुष की कुंडली में सूर्य को पंचम भाव का स्वामी माना जाता है। यही वजह है कि सूर्य को हमारे कुल का द्योतक भी माना गया है।

कन्यागते सवितरि पितरौ यान्ति वै सुतान,
अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिता:
श्रद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा ब्रजन्ति ते॥

अर्थात:- जब कन्या राशि में सूर्य प्रवेश करते हैं तब सभी पितृ अपने पुत्र- पौत्रों (पोतों) यानि कि अपने वंशजों के घर पधारते हैं। ऐसे में यदि आश्विन अमावास्या जो की पितृपक्ष के दौरान आती है, उस दिन इनका श्राद्ध नहीं किया जाये तो हमारे पितृ दुखी होकर और अपने वंशजों को श्राप देकर वापस अपने लोक को लौट जाते हैं। इसी वजह से इस दौरान अपनी यथासामर्थ उन्हें फूल, फल और जल आदि के मिश्रण से तर्पण देना चाहिए और उनकी प्रशंसा और तृप्ति के लिए प्रयास करना चाहिए।

श्राद्ध सारिणी

20 सितंबर 2021- पहला श्राद्ध (पूर्णिमा श्राद्ध)
21 सितंबर 2021- प्रतिपदा का श्राद्ध
22 सितंबर 2021- द्वितीया का श्राद्ध
23 सितंबर 2021- तृतीया का श्राद्ध
24 सितंबर 2021- चतुर्थी का श्राद्ध
25 सितंबर 2021 - पंचमी का श्राद्ध
26 सितंबर 2021 - इस दिन श्राद्ध तिथि नहीं है।  
27 सितंबर 2021 -षष्ठी का श्राद्ध
28 सितंबर 2021 - सप्तमी का श्राद्ध
29 सितंबर 2021- अष्टमी का श्राद्ध
30 सितंबर 2021- नवमी का श्राद्ध
1 अक्टूबर 2021- दशमी का श्राद्ध
2 अक्टूबर 2021- एकादशी का श्राद्ध
3 अक्टूबर 2021- द्वादशी का श्राद्ध
4 अक्टूबर 2021- त्रयोदशी का श्राद्ध
5 अक्टूबर 2021- चतुर्दशी का श्राद्ध
6 अक्टूबर 2021- सर्वपितृ श्राद्ध


पितृ तर्पण विधि/ श्राद्ध विधि (Pitri Tarpan Vidhi/ Shradh Vidhi):-


1. सुबह उठकर बिना साबुन लगाए स्नान कर साफ वस्त्र पहनें।स्नान कर बालों में तेल ना लगाएं।

2. देव स्थान व पितृ स्थान को गाय के गोबर लिपकर व गंगाजल से पवित्र करें। 

3. महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं। पितरों को देवता माना जाता है इसलिए उन्हें सात्विक वैष्णव भोजन   ही अर्पित किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध का भोजन बहुत ही साधारण और शुद्ध होना चाहिए वरना आपके पूर्वज उस खाने को ग्रहण नहीं करते और आपको श्राद्ध पूजा का पूरा लाभ नहीं मिल पाता श्राद्ध के भोजन में खीर, पूरी अनिवार्य होती है। जौ, मटर और सरसों का उपयोग करना श्रेष्ठ माना जाता है। ज्यादा पकवान पितरों की पसंद करने के लिए होने चाहिए। गंगाजल, दूध, शहद, कुश और तिल सबसे ज्यादा जरुरी है।तिल ज्यादा होने से उसका फल ज्यादा मिल सकता है। तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करने में मदद कर सकता हैं। 

4. भोजन तैयार कर एक थाली में लगाएं। साथ में एक गिलास पानी रखें।

5. श्राद्ध का अधिकारी श्रेष्ठ ब्राह्मण (या कुल के अधिकारी जैसे दामाद, भतीजा आदि) को न्यौता देकर बुलाएं।

6. ब्राह्मण से पितरों की पूजा एवं तर्पण आदि कराएं।

7. सर्वप्रथम हाथ में कुशा, जौ, काला तिल, अक्षत् एवं जल लेकर संकल्प करें- “ॐ अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त सर्व सांसारिक सुख-समृद्धि प्राप्ति च वंश-वृद्धि हेतव देवऋषिमनुष्यपितृतर्पणम च अहं करिष्ये।।” 

8. इसके बाद पितरों का आवाहन इस मन्त्र से करना चाहिए- “ब्रह्मादय:सुरा:सर्वे ऋषय:सनकादय:।आगच्छ्न्तु महाभाग ब्रह्मांड उदर वर्तिन:।।”

9. तत्पश्चात् इस मन्त्र से पितरों को तीन अंजलि जल अवश्य दे-“ॐआगच्छ्न्तु मे पितर इमम गृहणम जलांजलिम।।” अथवा “मम (अमुक) गोत्र अस्मत पिता-उनका नाम- वसुस्वरूप तृप्यताम इदम तिलोदकम तस्मै स्वधा नम:।।”

10. पितरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर अर्पित करें।
  • पितर प्रार्थना मंत्र:- तत्पश्चात पितरों की इस मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिए- “ॐ नमो व:पितरो रसाय नमो व:पितर: शोषाय नमो व:पितरो जीवाय नमो व:पितर:स्वधायै नमो व:पितरो घोराय नमो व:पितरो मन्यवे नमो व:पितर:पितरो नमो वो गृहाण मम पूजा पितरो दत्त सतो व:सर्व पितरो नमो नम:।”

11. श्राद्ध कर्म के दिन ब्राह्मण को भोजन कराने से पहले पंचबलि गाय, कुत्ते, कौए, देवतादि और चींटी के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें ।
  • गोबलि- गाय के लिए पत्ते पर 'गोभ्ये नमः' मंत्र पढकर भोजन सामग्री निकालें।
  • श्वानबलि- कुत्ते के लिए भी 'द्वौ श्वानौ नमः' मंत्र पढकर भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें ।
  • काकबलि- कौए के लिए 'वायसेभ्यो नमः' मंत्र पढकर पत्ते पर भोजन सामग्री निकालें ।
  • देवादिबलि- देवताओं के लिए 'देवादिभ्यो नमः' मंत्र पढकर और
  • चींटियों के लिए 'पिपीलिकादिभ्यो नमः' मंत्र पढकर चींटियों के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें।
12. इसके बाद ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं, मुखशुद्धि, वस्त्र, दक्षिणा आदि से सम्मान करें। ब्राह्मणों को भोजन कराते समय खासतौर पर इस बात का ध्यान रखें कि ब्राह्मण की बैठने की जगह साफ हो रेशमी, ऊनी, लकड़ी, कुश जैसे आसन पर ही बैठाएं। ऐसी मान्यता है कि लोहे के आसन पर ब्राह्मणों को कभी न बैठाना चाहिए। 

13. ब्राह्मण स्वस्तिवाचन तथा वैदिक पाठ करें, गृहस्थ एवं पितर के प्रति शुभकामनाएं व्यक्त करें।

14. घर में किए गए श्राद्ध का पुण्य तीर्थ-स्थल पर किए गए श्राद्ध से आठ गुना अधिक मिलता है। 

15. आर्थिक कारण या अन्य कारणों से यदि कोई व्यक्ति बड़ा श्राद्ध नहीं कर सकता लेकिन अपने पितरों की शांति के लिए वास्तव में कुछ करना चाहता है, तो उसे पूर्ण श्रद्धा भाव से अपने सामर्थ्य अनुसार उपलब्ध अन्न, साग-पात-फल और जो संभव हो सके उतनी दक्षिणा किसी ब्राह्मण को आदर भाव से दे देनी चाहिए। 

16. यदि किसी परिस्थिति में यह भी संभव न हो तो 7-8 मुट्ठी तिल, जल सहित किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर देने चाहिए। इससे भी श्राद्ध का पुण्य प्राप्त होता है। 

17.हिन्दू धर्म में गाय को विशेष महत्व दिया गया है। किसी गाय को भरपेट घास खिलाने से भी पितृ प्रसन्न होते हैं। 

18. यदि उपरोक्त में से कुछ भी संभव न हो तो किसी एकांत स्थान पर मध्याह्न समय में सूर्य की ओर दोनों हाथ उठाकर अपने पूर्वजों और सूर्य देव से प्रार्थना करनी चाहिए। 

  • प्रार्थना में कहना चाहिए कि, ‘हे प्रभु मैंने अपने हाथ आपके समक्ष फैला दिए हैं, मैं अपने पितरों की मुक्ति के लिए आपसे प्रार्थना करता हूं, मेरे पितर मेरी श्रद्धा भक्ति से संतुष्ट हो’। ऐसा करने से व्यक्ति को पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।
19. जो भी श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती। वह पर्व का पूर्ण फल भोगता है। 

किस दिन करें किसका श्राद्ध ? 


वर्तमान में भागदौड़ की जिंदगी और अंग्रेजी कैलेंडर ने बहुत कुछ विस्मृत कर दिया है। तिथि तो दूर लोग अपने पूर्वजों तक को भूल जाते हैं। फिर भी जिसे अपनी गलती का अहसास हो वह पश्चाताप जरुर करता है और इसे जानना भी चाहता है कि अपने पूर्वजों के प्रति किये गये अपने इस अपराधबोध से वह कैसे मुक्त हो? तो ऐसी स्थिति में भी धार्मिक ग्रंथ हमारे सहायक होते हैं। शास्त्रों में यह विधान दिया गया है कि यदि किसी को अपने पितरों, पूर्वजों के देहावसान की तिथि ज्ञात नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है।  
  • जिन जातकों की अकाल मृत्यु होती है यानि यदि वे किसी दुर्घटना का शिकार हुए हों या फिर उन्होंनें आत्महत्या की हो तो उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है।
  • विवाहित स्त्रियों का श्राद्ध केवल नवमी तिथि को किया जाना चाहिए।
  • नवमी तिथि को माता के श्राद्ध के लिए शुभ माना जाता है। 
  • पिता का श्राद्ध अष्टमी तिथि को करने की मान्यता है।
  • सन्यासी पितृगणों का श्राद्ध केवल द्वादशी तिथि को किया जाने का प्रावधान है।
  • नाना-नानी का श्राद्ध केवल आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ही करना उचित माना जाता है।
  • अविवाहित जातकों का श्राद्ध पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इसे कुंवारा श्राद्ध भी कहा जाता है। जिन लोगों की मृत्यु शादी से पहले हो जाती है। 
  • सर्वपितृ अमावस्या यानि आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन उन सभी ज्ञात-अज्ञात लोगों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु हुई है। 

श्राद्ध का महत्व बताने वाली पौराणिक कथा :-


पौराणिक कथा के अनुसार जोगे और भोगे नाम के दो भाई थे। दोनों अलग-अलग घरों में रहा करते थे। जोगे के पास धन की कोई कमी न थी, लेकिन भोगे निर्धन था। दोनों भाई एक दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। लेकिन जोगे की पत्नी को धन का अभिमान था, तो वहीं भोगे की पत्नी सुशील और शांत स्वाभाव की थी। जब पितृ पक्ष आने पर जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने के लिए कहा तो जोगे इसे व्यर्थ का कार्य समझकर टालने की कोशिश की, लेकिन जोगे की पत्नी केवल अपनी शान दिखाने के लिए श्राद्ध का कार्यक्रम रखना चाहती थी। ताकि वह अपने मायके पक्ष के लोगों को बुलाकर दावत कर सके। जोगे की पत्नी से उसने कहा कि मुझे कोई परेशानी न हो इसलिए आप ऐसा कह रहे हैं। लेकिन मैं सत्य कहती हूं, मुझे इसमें कोई परेशानी नहीं है, मैं भोगे की पत्नी को बुला लूंगी। हम दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी।

दूसरे दिन भोगे की पत्नी सुबह आकर सारा कार्य करवाने लगी, उसने अनेक पकवान बनाए, फिर सभी काम निपटाने के बाद अपने घर वापस आ गई, क्योंकि उसे भी पितरों का तर्पण करना था। जब पितर भूमि पर उतरे जब वे जोगे के यहां गए तो देखा कि उसके ससुराल पक्ष के सभी लोग भोजन पर जुटे हुए हैं। वहां ये सब देखकर वे बहुत निराश हुए उसके बाद जोगे-भोगे के पितर भोगे के यहां गए, तो देखते हैं कि मात्र पितरों के नाम पर केवल 'अगियारी' दे दी गई है। पितर उसकी राख चाटते हैं, और भूखे ही नदी के तट पर पहुंच जाते हैं।

कुछ ही देर में सारे पितर अपने-अपने यहां का श्राद्ध ग्रहण करके इकट्ठे हो गए और बताने लगे कि उनकी संतानों ने किस-किस तरह से उनके लिए श्राद्धों के पकवान बनाए। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपना सारा कुछ बताया। उन्होंने सोचा कि अगर भोगे निर्धन न होता और श्राद्ध करने में समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा वापस नहीं आने पड़ता, क्योंकि भोगे के घर में तो खाने के लिए भी दो जून की रोटी नहीं थी। ये सारी बातें सोचकर पितरों को भोगे पर दया आ गई। अचानक से वे नाच-नाचकर गाने लगे कि भोगे के घर धन हो जाए, भोगे के घर धन हो जाए।

सांझ का समय हो चला था, लेकिन भोगे के घर में खाने को कुछ भी नहीं था। उसके बच्चे भूखे थे। बच्चों ने अपनी मां से कहा कि भूख लगी है। तब उन्हें टालने के लिए गुस्से से गरज कर भोगे की पत्नी ने कहा कि जाओ आंगन में हौदी औंधी रखी है, उसे जाकर खोल लो उसमें जो भी मिल जाए आपस में बांटकर खा लेना। बच्चे जब वहां जाकर हौदी देखते हैं, तो वे दौड़े-दौड़े मां के पास जाकर कहते हैं कि मां हौदी तो मोहरों से भरी पड़ी है। आंगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह सब कुछ देखती है, तो उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता है।

इस तरह पितरों के आशीर्वाद से भोगे भी धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है, लेकिन वह इस बात का बिल्कुल अंहकार नहीं करता है, और अगले बरस पूरी श्रद्धा के साथ भोगे एवं उसकी पत्नी अपने पितरों का श्राद्ध करते हैं। भोगे की पत्नी पितरों के लिए 56 प्रकार के व्यंजन तैयार करती है, वे दोनों ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं, अपने जेठ-जेठानी को बुलाकर सम्मान के साथ सोने और चांदी के बर्तनों में भोजन कराते हैं। इससे उनके पितर बहुत प्रसन्न होते हैं। 


पितृपक्ष के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें :-


श्राद्धपक्ष के दौरान यदि आप अपने पितरों का श्राद्ध कर रहे हैं तो इन बातों के बारे में खास ध्यान रखना चाहिए….

  • श्राद्ध कर्म के अनुष्ठान में परिवार का सबसे बड़ा सदस्य, विशेष रूप से परिवार का सबसे बड़ा बेटा शामिल होता है।
  • पितरों का श्राद्ध करने से पूर्व स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पितरों का तर्पण करते समय हाथ में कुश घास से बनी अंगूठी पहनना चाहिए। कुश घास दया का प्रतीक है और इसका उपयोग पूर्वजों का आह्वान करने के लिए किया जाता है।
  • पितर पक्ष में पिंड दान के एक भाग के रूप में जौ के आटे, तिल और चावल से बने गोलाकार पिंड को भेंट करें।
  • भगवान विष्णु को दूर्वा घास के नाम से जाना जाता है। 
  • श्राद्ध के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए भोजन को सबसे पहले कौवे, गाय और कुत्तों को अर्पित करें।मान्यता है पितरदेव ये रूप धारण कर भोज करने आते हैं।कौए को यम का दूत माना जाता है।
  • पितृपक्ष में ब्राह्राणों को भोजन और दक्षिणा अर्पित करें और गंगा अवतराम, नचिकेता, अग्नि पुराण और गरुड़ पुराण की कथाओं का पाठ करें।पितृपक्ष से संबंधित मंत्रों का जाप भी करना चाहिए।
  • पितृ पक्ष मंत्र का जाप करें-

"ये बान्धवा बान्धवा वा ये नजन्मनी बान्धवा"
ते तृप्तिमखिला यन्तुं यश्र्छमतत्तो अलवक्ष्छति। ”

पितृपक्ष के दौरान न करें ये काम :-


  • शास्त्रों में कहा गया है कि पितृपक्ष के दौरान किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। इस दौरान न ही किसी तरह का वाहन या कोई नया सामान खरीदना चाहिए।
  • पितृपक्ष के दौरान मांसाहारी भोजन नहीं करना चाहिए।
  • पितृपक्ष में बिना जनेऊ धारण करें पितरों का तर्पण नहीं करना चाहिए।श्राद्ध कर्म के दौरान आप जनेऊ पहनते हैं तो पिंडदान के दौरान उसे बाएं की जगह दाएं कंधे पर रखें।
  • अनुष्ठान के लिए लोहे के बर्तन का उपयोग न करें। इसके बजाय अपने पूर्वजों को खुश करने के लिए सोने, चांदी, तांबे या पीतल के बर्तन का उपयोग करें।
  • यदि किसी विशेष स्थान पर श्राद्ध कर्म किया जाता है तो यह विशेष फल देता है। कहा जाता है कि गया, प्रयाग, बद्रीनाथ में श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। जो किसी भी कारण से इन पवित्र तीर्थों पर श्राद्ध कर्म नहीं कर सकते हैं वे अपने घर के आंगन में किसी भी पवित्र स्थान पर तर्पण और पिंड दान कर सकते हैं।
  • ऐसा माना जाता है कि पितृ पक्ष के पखवाड़े में पितृ किसी भी रूप में आपके घर में आते हैं। इसलिए, इस पखवाड़े में, किसी भी पशु या इंसान का अनादर नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि, आपके दरवाजे पर आने वाले किसी भी प्राणी को भोजन दिया जाना चाहिए और आदर सत्कार करना चाहिए।
  • श्राद्ध कर्म शाम, रात, सुबह या अंधेरे के दौरान नहीं किया जाना चाहिए।
  • श्राद्ध कर्म के लिए काले तिल का उपयोग करना चाहिए। इसके लिए आप सफेद तिल का इस्तेमाल करना ना भूलें। पिंडदान करते वक्त तुलसी जरूर रखें।
  • पितृ पक्ष में कुछ चीजों को खाना मना है, जैसे- चना, दाल, जीरा, काला नमक, लौकी और खीरा, सरसों का साग आदि नहीं खाना चाहिए।
  • तंबाकू, धूम्रपान सिगरेट या शराब का सेवन न करें। इस तरह के बुरे व्यवहार में लिप्त न हों। यह श्राद्ध कर्म करने के फलदायक परिणाम को बाधित करता है।
  • पितृ पक्ष में, गायों, ब्राह्मणों, कुत्तों, चींटियों, बिल्लियों और ब्राह्मणों को यथासंभव भोजन करना चाहिए। 
  • परिवार में आपसी कलह से बचें। पितृ पक्ष में श्राद्ध करने वाले व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन करना चाहिए।
  • यदि संभव हो, तो सभी 16 दिनों के लिए घर में चप्पल न पहनें।
  • श्राद्ध कर्मकांड करने वाले व्यक्ति को अपने नाखून नहीं काटने चाहिए। इसके अलावा उसे दाढ़ी या बाल भी नहीं कटवाने चाहिए। क्योंकि श्राद्ध पक्ष पितरों को याद करने का समय होता है। यह एक तरह से शोक व्यक्त करने का तरीका है।
  • भौतिक सुख के साधन जैसे स्वर्ण आभूषण, नए वस्त्र, वाहन इन दिनों खरीदना अच्छा नहीं माना गया है, क्योंकि यह शोक काल होता है।
  • पितृपक्ष के दौरान किसी भी परिस्थिति में झूठ न बोले और कटु वचन से किसी को दुख पहुंचाएं।
  • पितृपक्ष के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि घर का कोई भी कोना अंधेरे में न रहे।
  • पितृपक्ष में कुल की मर्यादा के विरुद्ध कोई आचरण न करें। 

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