Chhath Puja 2020 Puja Vidhi, Shubh Muhurat, Timings: कब दिया जायेगा सूर्य को ऊषा अर्घ्य, क्या है शुभ मुहूर्त, विधि, मंत्र, महत्व और कथा

भारत देश त्योहारों का देश हैं जहाँ धर्म का अपना ही महत्व हैं ।छठ पूजा में सूर्य देव एवं माता छठी की उपासना कर उनका अभिवादन किया जाता हैं। ऊर्जा के सबसे बड़े स्त्रोत भगवान सूर्य हैं जिनका हमारे जीवन में विशेष महत्व हैं।हमारे देश में कृतज्ञ होना सिखाया जाता हैं जिनमें हम हर उस चीज के प्रति कृतज्ञ हैं जिसने हमारे जीवन में अपना योगदान दिया उसी तरह छठ पूजा के जरिये हम सूर्य देवता को धन्यवाद देते हैं ।यही एक कारण हैं ही हम भारतवासी भावुक होते हैं, हमें हमारे धर्म से ही कोमलता का भाव मिलता हैं और यही भाव हमें दिल से एक-दूसरे का बनाता हैं।यही भाव हमें जीवन से जुड़ी हर सजीव और निर्जीव वस्तु का महत्त्व समझाता हैं ।

कब मनाया जाता है छठ पूजा का पर्व



सूर्य देव की आराधना का यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल षष्ठी व कार्तिक शुक्ल षष्ठी इन दो तिथियों को यह पर्व मनाया जाता है। हालांकि कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाये जाने वाला छठ पर्व मुख्य माना जाता है। कार्तिक छठ पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व को छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि कई नामों से जाना जाता है।कई लोग इस पर्व को 'हठयोग' भी कहते है। छठ पूजा बिहार का महापर्व हैं। हालाँकि अब यह पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता है।

क्यों करते हैं छठ पूजा



छठ पूजा करने या उपवास रखने के सबके अपने अपने कारण होते हैं लेकिन मुख्य रूप से छठ पूजा सूर्य देव की उपासना कर उनकी कृपा पाने के लिये की जाती है। सूर्य देव की कृपा से सेहत अच्छी रहती है। सूर्य देव की कृपा से घर में धन धान्य के भंडार भरे रहते हैं। छठ माई संतान प्रदान करती हैं। सूर्य सी श्रेष्ठ संतान के लिये भी यह उपवास रखा जाता है। अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये भी इस व्रत को रखा जाता है।


2020 में कब है छठ पूजा? | When did Chhath begin in 2020?



परंपरागत रूप में, यह त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है। यह ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक अक्टूबर या नवंबर के दौरान पड़ता है। साथ ही दिवाली के बाद 6वें दिन मनाया जाता है। साल 2020 में षष्ठी तिथि 20 नवंबर 2020 शुक्रवार को है। वहीं छठ पूजा (chhat puja) की शुरुआत चतुर्थी तिथि यानि नहाय खाय 18 नवंबर को होगी और 19 नवंबर यानि पंचमी तिथि को लोहंडा और खरना होगा। इसके बाद छठी यानि 20 नवंबर  को छठ पूजा की जाएगी और 21 नवंबर  को पारण किया जाएगा। 

छठ पूजा का शुभ मुहूर्त

नहाय-खाय: 18 नवंबर 2020, बुधवार, सूर्योदय: 06 बजकर 46 मिनट और सूर्यास्त: 05 बजकर 26 मिनट ।
खरना या लोहंडा: 19 नवंबर 2020, गुरुवार, सूर्योदय: 06 बजकर 47 मिनट और सूर्यास्त: 05 बजकर 26 मिनट।
संध्या सूर्य अर्घ्य: 20 नवंबर 2020, शुक्रवार, सूर्योदय: 06 बजकर 48 मिनट और सूर्यास्त: 05 बजकर 26 मिनट।
ऊषा सूर्य अर्घ्य: 21 नवंबर 2020, शनिवार, सूर्योदय: 06 बजकर 49 बजे और सूर्यास्त: 05 बजकर 25 मिनट।
छठ पूजा पारण: 21 नवंबर 2020 शनिवार, सूर्योदय के समय अर्घ्य देने का समय सुबह 6 बजकर 48 मिनट है। 
षष्ठी तिथि आरंभ : रात्रि 9 बजकर 58 मिनट से ( 19 नवंबर 2020)
षष्ठी तिथि समाप्त: रात्रि 9 बजकर 29 मिनट से ( 20 नवंबर 2020)


जानिए नहाय-खाय, खरना, अर्घ्य, पारण और पूजा की विधि | Know Nahai-Khay, Kharna, Arghya, Paran and method of worship:-


भगवान सूर्य देव को सम्पूर्ण रूप से समर्पित यह त्योहार पूरी स्वच्छता के साथ मनाया जाता है। रामायण और महाभारत जैसी पौराणिक शास्त्रों में भी इस पावन पर्व का उल्लेख है।हिन्दू धर्म में इस पर्व का एक अलग ही महत्व है, जिसे पुरुष और स्त्री बहुत ही सहजता से पूरा करते है। चार दिनों तक मनाये जाने वाले इस पर्व के दौरान शरीर और मन को पूरी तरह से साधना पड़ता है।

मंत्र :-


ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं |
अर्घ्यं च फलं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम् ||


नहाय-खाय:-



छठ व्रत की शुरुआत नहाय खाय के साथ होती है। यह व्रत का पहला दिन होता है। इस दिन स्नान के बाद साफ-सुथरे वस्त्र पहने जाते हैं व पूजा के बाद व्रती अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सब्जी को प्रसाद के रूप में ग्रहण करेंगे। खाने में कद्दू का महत्व बेहद विशेष है और इसे जरूर इस दिन खाया जाना चाहिए। इस दिन पूजा की तैयारी आदि भी की जाती है।

खरना या लोहंडा:-


यह व्रत का दूसरा दिन होता है। व्रत करने वाले इस पूरे दिन उपवास करते हैं। रात्रि में स्नान कर भगवान भाष्कर का ध्यान करने के बाद रोटी और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद तैयार कर सूर्य देव और छठी मईया को अर्पित करते हैं । उसके बाद व्रती स्वयं प्रसाद के रूप में खीर,रोटी और फल आदि ग्रहण करते हैं । इस दिन नमक भी नहीं खाया जाता है। साथ ही पड़ोसियों और नाते-रिश्तेदारों को भी प्रसाद खिलाने के लिए बुलाया जाता है।

संध्या अर्घ्य:-


कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि षष्ठी के दिन प्रात:काल स्नानादि के बाद संकल्प लिया जाता है। संकल्प लेते समय निम्न मन्त्रों का उच्चारण किया जाता है।
ऊं अद्य अमुकगोत्रोअमुकनामाहं मम सर्व
पापनक्षयपूर्वकशरीरारोग्यार्थ श्री
सूर्यनारायणदेवप्रसन्नार्थ श्री सूर्यषष्ठीव्रत करिष्ये।

षष्ठी तिथि को उपवास रखकर व्रतियां प्रसाद बनाती हैं।प्रसाद आदि बन जाने के बाद शाम को बांस से बने दउरा में  ठेकुआ, फल, ईख समेत अन्य सामग्रियां, लड्डू, जल, दूध आदि दूसरी चीजें से सजाया जाता है।परिवार के लोग व्रत करने वाले के साथ इस टोकरी को उठाकर किसी नदी या तालाब के किनारे जाते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस पूरे दिन व्रती उपवास करते हैं और जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है।

निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए तीन बार अस्त होते हुए सूर्यदेव को अर्ध्य दिया जाता है -

ऊं एहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पया मां भवत्या गृहाणार्ध्य नमोअस्तुते॥

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शाम के अर्ग के बाद छठी माता के गीत गाये जाते है और व्रत कथाये सुनी जाती है।


सुबह का अर्घ्य:- 



छठ पूजा के चौथे दिन सुबह सूर्योदय के वक्त भगवान सूर्य को अर्ग दिया जाता है। आज के दिन सूर्य निकलने से पहले ही व्रती व्यक्ति को घाट पर पहुंचना होता है और उगते हुए सूर्य को अर्ग देना होता है। अर्ग देने के तुरंत बाद छठी माता से घर-परिवार की सुख-शांति और संतान की रक्षा का वरदान माँगा जाता है। इस पावन पूजन के बाद सभी में प्रसाद बांट कर व्रती खुद भी प्रसाद खाकर व्रत खोलते है।


इस पर्व से जुड़ी एक पौराणिक परंपरा के अनुसार जब छठी माता से मांगी हुई मुराद पूरी हो जाती है तब सारे वर्ती सूर्य भगवान की दंडवत आराधाना करते है। सूर्य को दंडवत प्रणाम करने की विधि काफी कठिन होती है। दंडवत प्रणाम की प्रक्रिया कुछ इस प्रकार है: पहले सीधे खड़े होकर सूर्य देव को सूर्य नमस्कार किया जाता है और उसके पश्चात् पेट के बल जमीन पर लेटकर दाहिने हाथ से जमीन पर एक रेखा खिंची जाती है। इस प्रक्रिया को घाट पर पहुँचने तक बार-बार दोहराया जाता है। इस प्रक्रिया से पहले सारे वर्ती अपने घरों के कुल देवता की आराधना करते है।

छठ पूजा क्यों की जाती है? |  Why is Chhath Puja performed?



इस सवाल पर अनेकों ऋषियों एवं विद्यावानों के अलग-अलग राय है। इसी वजह से इस पवित्र पर्व को लेकर कई कथाएँ सामने आती है। इनमें से प्रमुख कहानियां कुछ इस प्रकार है:

प्रथम कथा अनुसार, राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी के कोई संतान नहीं थी। इस बात से राजा-रानी बड़े दुखी रहते थे। एक दिन उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ संपन्न होने बाद महर्षि ने मालिनी को खीर दी। खीर का सेवन करने से मालिनी गर्भवती हो गई और 9 महीने बाद उसने पुत्र को जन्म दिया लेकिन उसका पुत्र मृत जन्मा। इस बात का पता लगते ही राजा बहुत दुखी हुआ और निराशा की वजह से आत्महत्या करने का मन बना लिया, परंतु जैसे ही राजा ने आत्महत्या करने की कोशिश की उनके सामने भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने कहा कि मैं षष्ठी देवी हूँ और मैं लोगों को पुत्र का सौभाग्य प्रदान करती हूँ। इसके अलावा जो सच्चे मन से मेरी पूजा करते हैं उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होती हैं। यदि राजन तुम मेरी विधिविधान से पूजा करोगे तो मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करुँगी। देवी के कहे अनुसार राजा प्रियव्रत ने कार्तिक शुक्ल की षष्ठी तिथि के दिन देवी षष्ठी की पूरे विधिपूर्वक पूजा की। इस पूजा के फलस्वरूप रानी मालिनी गर्भवती हुई और उन्होंने एक सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। तभी से छठ का पावन पर्व मनाया जाने लगा। 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान श्री राम ने रावन को मार कर लंका पर विजय हासिल की थी, तब अयोध्या वापस आ कर उन्होंने सूर्यवंशी होने के अपने कर्तव्य को पूरा करने हेतु अपने कुल देवता भगवान सूर्य की आराधना की थी। उन्होंने देवी सीता के साथ इस पावन व्रत को रखा था। सरयू नदी में शाम और सुबह सूर्य को अर्ग दे कर उन्होंने अपने व्रत को पूर्ण किया। उन्हें देख कर आम व्यक्ति भी इसी भाति छठ व्रत को रखने लगे।

महाभारत कथाओं के अनुसार जब कर्ण को अंग देश का राजा बनाया गया तब वो नित-दिन सुबह और शाम सूर्य देव की आराधना करते थे। खास कर हर षष्ठी और सप्तमी को सूर्य पुत्र अंग राज कर्ण भगवान सूर्य की विशेष पूजा करते थे। अपने राजा को इस तरह पूजा करते देख अंग देश की जनता भी प्रतिदिन सूर्योदय और सूर्यास्त पर भगवान सूर्य की आराधना करने लगे और देखते ही देखते यह पूजा पुरे क्षेत्र में प्रसिद्ध  हो गयी।

एक और कथा अनुसार साधु की हत्या का प्राश्चित करने हेतु जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती और माद्री के साथ वनवास गुजार रहे थे। उन दिनों पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा ले कर रानी कुंती ने सरस्वती नदी में भगवान सूर्य को अर्ग दिया था। इस पूजा के कुछ महीनो बाद ही कुंती पुत्रवती हुई थी। इस पर्व को द्रौपदी द्वारा भी किया गया है। कहते है, इस पर्व को करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।


छठ पूजा करने वाले वर्तियों को कई तरह के नियमों का पालन करना पड़ता है। उनमें से प्रमुख नियम निम्नलिखित है:-


  • इस पर्व में पुरे चार दिन शुद्ध कपड़े पहने जाते है। कपड़ो में सिलाई ना होने का पूर्ण रूप से ध्यान रखा जाता है। महिलाएं साड़ी और पुरुष  धोती धारण करते है।
  • पुरे चार दिन व्रत करने वाले वर्तियों का जमीन पर सोना अनिवार्य होता है। कम्बल और चटाई का प्रयोग करना उनके इच्छा पे निर्भर करता है।
  • इन दिनों प्याज, लहसुन और मांस-मछली का सेवन करना वर्जित है।
  • पूजा के बाद अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार ब्राम्हणों को भोजन कराया जाता है।
  • इस पावन पर्व में वर्तियों के पास बांस के सूप का होना अनिवार्य है।
  • प्रसाद के तौर पर गेहूँ और गुड़ के आटों से बना ठेकुआ और फलों में केले प्रमुख है।
  • अर्ग देते वक्त सारी वर्तियों के पास गन्ना होना आवश्यक है। गन्ने से भगवान सूर्य को अर्ग दिया जाता है।

छठ पूजा का वैज्ञानिक महत्व


धार्मिक महत्व के अलावा, इन अनुष्ठानों से जुड़े कई वैज्ञानिक तथ्य हैं। श्रद्धालु आमतौर पर सूर्योदय या सूर्यास्त के दौरान नदी तट पर प्रार्थना करते हैं और यह वैज्ञानिक रूप से इस तथ्य के साथ समर्थित है कि, सौर ऊर्जा इन दो समयों के दौरान पराबैंगनी विकिरणों का निम्नतम स्तर है और यह वास्तव में शरीर के लिए फायदेमंद है। यह पारंपरिक त्योहार आपको सकारात्मकता दिखाता है और आपके मन, आत्मा और शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करता है। यह शक्तिशाली सूर्य को निहार कर आपके शरीर की सभी नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करने में मदद करता है।


नोट :- हालांकि कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच सामाजिक दूरी के आह्वान को देखते हुए इस बार घर पर ही पर्व करना सुरक्षित रहेगा। छठ घाट पर होने वाली भीड़ से बचने के लिए व्रती लोग घर पर ही कृत्रिम घाट बनाकर सूर्योपासना का महापर्व कर सकते हैं।

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