Navratri 2020 : श्रीदेवी जी की आरती ...जगजननी जय ! जय ! माँ ! जगजननी जय ! जय !

नवरात्रि में पूजा के समय जरूर करें मां दुर्गा की आरती, खुलेंगे उन्नति के द्वार





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नवरात्रि में मां दुर्गा की उपासना का विशेष महत्व है। नवरात्रि के समय विधि विधान से मां दुर्गा की पूजा अर्चना की जाती है, जिससे वे प्रसन्न होकर भक्तों के दुखों को हर लेती हैं। साथ ही वे सभी मनोकामनाओं को भी पूर्ण करती हैं। पूजा के दौरान आरती जरूरी है। आरती करते समय माता की आरती जगजननी जय ! जय ! माँ ! जगजननी जय ! जय !... का गान जरूर करें।

आरती के समय थाल में कपूर या फिर गाय के घी का दीपक जलाकर मां दुर्गा की आरती करनी चाहिए। आरती के साथ ही शंख और घंटी अवश्य बजाएं। आरती के समय शंघनाद और घंटी की ध्वनि से घर के अंदर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। नकारात्मकता के खत्म होने से व्यक्ति का विकास होता है, उन्नति के द्वार खुल जाते हैं।

नवरात्रि में प्रत्येक दिन प्रात:काल और संध्या की पूजा के समय आरती नियम पूर्वक करें।



श्रीदेवी जी की आरती |  Shridevi ji ki aarti


जगजननी जय ! जय ! माँ ! जगजननी जय ! जय !
भयहारिणि, भवतारिणि, भवभामिनि जय ! जय !! जगo

तू ही सत-चित-सुखमय शुद्ध ब्रह्मरुपा ।
सत्य सनातन सुन्दर पर-शिव सुर-भूपा ।।१।। जगo

आदि अनादि अनामय अविचल अविनाशी ।
अमल अनन्त अगोचर अज आनँदराशी ।।२।। जगo

अविकारी, अघहारी, अकल, कलाधारी ।
कर्त्ता विधि, भर्त्ता हरि, हर सँहारकारी ।।३।। जगo

तू विधिवधु, रमा, तू उमा, महामाया ।
मूल प्रकृति विद्या तू, तू जननी, जाया ।।४।। जगo

राम, कृष्ण तू, सीता, व्रजरानी राधा ।
तू वाण्छाकल्पद्रुम, हारिणि सब बाधा ।।५।। जगo

दश विद्या, नव दुर्गा, नानाशस्त्रकरा ।
अष्टमातृका, योगिनि, नव नव रूप धरा ।।६।। जगo

तू परधामनिवासिनि, महाविलासिनि तू ।
तू ही श्मशानविहारिणि, ताण्डवलासिनि तू ।।७ ।। जगo

सुर-मुनि-मोहिनि सौम्या तू शोभाssधारा ।
विवसन विकट-सरुपा, प्रलयमयी धारा ।।८ ।। जगo






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तू ही स्नेह-सुधामयि, तू अति गरलमना ।
रत्नविभूषित तू ही, तू ही अस्थि-तना ।।९।। जगo

मूलाधारनिवासिनि, इह-पर-सिद्धिप्रदे ।
कालातीता काली, कमला तू वरदे ।।१०।। जगo

शक्ति शक्तिधर तू ही नित्य अभेदमयी ।
भेदप्रदर्शिनि वाणी विमले ! वेदत्रयी ।।११।। जगo

हम अति दीन दुखी मा ! विपत-जाल घेरे ।
हैं कपूत अति कपटी, पर बालक तेरे ।।१२।। जगo

निज स्वभाववश जननी ! दयादृष्टि कीजै ।
करुणा कर करुणामयि ! चरण-शरण दीजै ।।१३।। जगo



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