हरतालिका तीज सम्पूर्ण व्रत-कथा | Hartalikla Teej Vrat Katha in Hindi




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हरतालिका तीज व्रत-कथा 

(पूजन करने के बाद कथा सुनें) सूतजी कहते हैं - मन्दार की माला से जिन (पार्वतीजी) का केशपाश अलंकृत हैं और मुण्डों की माला से जिन (शिवजी) की जटा अलंकृत हैं ,जो (पार्वतीजी) दिव्य वस्त्र धारण की हैं और जो (शिवजी) दिगम्बर (नंगे) हैं ,ऐसी श्री पार्वतीजी तथा श्री शिवजी को प्रणाम करता हूँ ॥1॥रमणीक कैलाश पर्वत के शिखर पर बैठी हुई श्री पार्वतीजी कहती हैं -हे महेश्वर ! हमें कोई गुप्त व्रत या पूजन बताइये ॥2॥ जो सब धर्मो में सरल हो ,जिसमें परिश्रम भी कम करना पड़े , लेकिन फल अधिक मिले । हे नाथ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हों तो यह विधान बताइये ॥3॥हे प्रभो ! किस तप ,व्रत या दान से आदि ,मध्य और अन्त रहित आप जैसे महाप्रभु हमको प्राप्त हुए हैं ।॥4॥



शिवजी बोले -हे देवी ! सुनो ,मैं तुमको एक व्रत जो मेरा सर्वस्व और छिपाने योग्य हैं , लेकिन तुम्हारे प्रेम के वशीभूत होकर मैं तुम्हे बतलाता हूँ।॥5॥

शिवजी ने कहा -भारतवर्ष में जैसे नक्षत्रों में चन्द्रमा , ग्रहों में सूर्य , वर्णो में ब्राम्हण ,देवताओं में विष्णु भगवान ॥6॥ नदियों में गंगा ,पुराणों में महाभारत , वेदों में सामवेद और इन्द्रियों में मन श्रेष्ठ हैं।॥7॥सब पुराणों और वेदों का सर्वस्व जिस तरह कहा गया हैं , मैं तुम्हें एक प्राचीन व्रत बतलाता हूँ ,एकाग्र  मन से सुनो ॥8॥जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसान प्राप्त किया है, वह में तुमको बतलाऊँगा , क्योंकि तुम मेरी प्रेयसी हो।॥9॥भाद्रपद मास में हस्त नक्षत्र से युक्त शुक्लपक्ष  की तृतीया तिथि को उसका अनुष्ठान मात्र करने से स्त्रियाँ सब पापों से मुक्त हो जाती है।॥10॥ हे देवी ! तुमने आज से बहुत दिनों पहले हिमालय पर्वत पर इस व्रत को किया था ,यह वृत्तान्त मैं तुमसे कहूँगा।॥11॥ पार्वतीजी ने पुछा - हे नाथ मैंने यह व्रत क्यों किया था यह सब आपके मुख से सुनना चाहती हूँ ।॥12॥उत्तर की ओर एक बड़ा रमणीक और पर्वतों में श्रेष्ठ हिमवान नामक पर्वत है । उसके आस-पास तरह-तरह को भूमियाँ हैं , तरह-तरह के वृक्ष उस पर लगे हुए हैं ॥13॥





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नाना प्रकार के पक्षी और अनेक प्रकार के पशु उस स्थान पर निवास करते हैं ।वहाँ पहुँचकर गन्धर्वों के साथ बहुत से देवता , सिद्ध , चारण, पक्षीगण सर्वदा प्रसन्न मन से विचरते हैं ।वहाँ पहुँचकर गन्धर्व गाते हैं, अप्सराएँ नाचती हैं । उस पर्वतराज के कितने ही शिखर ऐसे हैं कि जिनमें स्फटिक, रत्न और वैदूर्यमणि आदि खानें भरी हैं ।॥14-15॥ यह पर्वत ऊंचा तो इतना अधिक हैं कि मित्र के घर की तरह समझकर आकाश को स्पर्श किये रहता है।उसके समस्त शिखर सदैव हिम (बर्फ) से आच्छादित रहते हैं और गङ्गा-जल की ध्वनि सदा सुनाई देती रहती हैं ॥16॥हे पार्वती ! तुमने बाल्यकाल में उसी पर्वत पर तपस्या की थी ।बारह वर्षों तक तुम उलटी टंगकर केवल धुआँ पीकर रही ॥17॥ चौंसठ वर्षों तक सूखे पत्ते खाकर रही ।माघ मास  में तुम जल में बैठी रहती और वैशाख कि दुपहरिया में पंचाग्नि तापती थी ॥18॥


श्रावण महीने में जल बरसता तो तुम भूखी-प्यासी रहकर मैदान में बैठी रहती थी ।तुम्हारे पिता इस तरह का कष्ट सहन को देखकर बड़े दुःखी हुए।॥19॥वे चिंता में पड़ गये कि मैं अपनी कन्या किसको दूँ ,उसी समय नारदजी वहाँ आ पहुँचे।॥20॥
मुनिश्रेष्ठ नारदजी उस समय तुम्हें देखने गये थे , नारदजी को देखकर गिरी ने अर्ध्य ,पाध, आसन आदि देकर उनकी पूजा की॥21॥ हिमवान बोले -हे स्वामिन ! आप किसलिए आये हैं ।मेरा अहोभाग्य हैं , आपका आगमन मेरे लिए अच्छा हैं ।॥22॥नारदजी ने कहा- हे पर्वतराज ! सुनो ,मैं भगवान विष्णु का भेजा हुआ आपके पास आया हूँ ।आपको चाहिए की योग्य कन्यारत्न किसी योग्य वर को दें।॥23॥ भगवान विष्णु के समान योग्य वर ब्रम्हा , इन्द्र और शिव इनमें से कोई नहीं हैं ।इसलिए मैं यही कहूँगा की आप अपनी कन्या भगवान विष्णु को ही देवें।॥24॥



हिमवान ने कहा -भगवान विष्णु स्वयं मेरी कन्या ले रहे हैं और आप यह सन्देश लेकर आये हैं तो मैं उन्हें ही अपनी कन्या दूँगा।॥25॥ हिमवान की इतनी बात सुनकर मुनिराज नारद आकाश में विलीन हो गये ।वे पीताम्बर, शंख, चक्र और गदाधारी भगवान विष्णु के पास पहुँचे।॥26॥ वहाँ हाथ जोड़कर नारदजी ने भगवान विष्णु से कहा -हे देव ! सुनिये, मैंने आपका विवाह पक्का करा दिया।॥27॥ उधर हिमवान ने पार्वती के पास जाकर कहा कि हे पुत्री! मैंने तुम्हें भगवान विष्णु को दे डाला।॥28॥ तब पिता की बात सुनकर तुम बिना उत्तर दिए ही सखी के घर चली गई वही जमीन पर पड़कर तुम दुःखी होती हुई विलाप करने लगी। ॥29॥तुमको इस प्रकार विलाप करती हुई  देखकर सखी बोली -तुम इतनी दुःखी क्यों हो, इसका कारण बताओ।॥30॥


तुम्हारी जो कुछ इच्छा होगी मैं यथाशक्ति उसको पूरा करने की चेष्टा करुँगी ,इसमें कोई संशय नहीं हैं।पार्वती बोलीं- मेरी जो कुछ अभिलाषा हैं उसे तुम प्रेमपूर्वक सुनो ,मैं एकमात्र शिवजी को अपना पति बनाना चाहती हूँ, इसमें कुछ संशय नहीं हैं।मेरे इस विचार को पिताजी ने ठुकरा दिया है।॥31-32॥इससे मैं अपने शरीर को त्याग दूँगी।पार्वती की इस बात को सुनकर सखियों ने कहा।॥33॥ शरीर का त्याग न करो।चलो, किसी ऐसे वन को चलें जहाँ पिता को पता न लगे। ऐसी सलाह कर तुम वैसे वन में जा पहुँची।॥34॥ उधर तुम्हारे पिता घर-घर तुम्हें खोजने लगे।दूतों द्वारा भी खबर लेने लगे कि कौन देवता या कित्रर मेरी पुत्री को हरण करके ले गया है ?॥35॥ उन्होंने अपने मन-ही-मन कहा -मैं नारद जी के आगे प्रतिज्ञा कर चूका हूँ कि अपनी पुत्री भगवान विष्णु को दूँगा। ऐसा सोचते-सोचते हिमवान मूर्च्छित हो गये।॥36॥गिरिराज को मूर्च्छित देकर सब लोग हाहाकार करते दौड़ पड़े।जब होश आया तो सब पूछने लगे कि हे गिरिराज ! आप अपनी मूर्छा का कारण बताइये।॥37॥



हिमवान ने कहा - आप लोग मेरे दुःख का कारण सुनें, न मालूम कौन मेरी कन्या को हरण करके ले गया है। ऐसा नहीं हुआ तो उसे किसी काले साँप ने काट लिया या सिंह खा गये होंगे। ॥38॥ हाय ! हाय ! मेरी बेटी कहाँ गयी ? किसी दुष्ट ने मेरी पुत्री को मार डाला।ऐसा कह वे वायु के झोंके-से काँपते हुए वृक्ष के समान काँपने लगे। ॥39॥ इसके बाद हिमवान तुम्हें वन-वन खोजने लगे। वह वन भी सिंह, भालू,हिंसक जन्तुओं से बड़ा भयानक हो रहा था ॥40॥ तुम भी अपनी सखियों के साथ उस भयानक वन में चलती-चलती एक ऐसी जगह जा पहुँची जहाँ एक नदी बह रही थी, उसके रमणीक तट पर एक बड़ी-सी कन्दरा थी।॥41॥ तुमने उसी कन्दरा में आश्रम बना लिया और मेरी एक बालुकामयी प्रतिमा बनाकर अपनी सखियों के साथ निराहार रहकर मेरी आराधना करने लगी। ॥42॥


जब भाद्रपद शुक्लपक्ष की हस्तयुक्त तृतीया तिथि प्राप्त हुई तब तुमने मेरा विधिवत पूजन किया और रातभर जागकर गीत-वाधादि से मुझे प्रसन्न करने में बिताया।उस व्रतराज के प्रभाव से मेरा आसन डगमगा उठा। जिससे मैं तत्काल उस स्थान पर जा पहुँचा, जहाँ पर तुम अपनी सखियों के साथ रहती थी। ॥43-44॥ वहाँ पहुँचकर मैंने तुमसे कहा कि मैं तुमपर प्रसन्न हूँ ,बोलो क्या चाहती हो ? तुमने कहा - मेरे देवता ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं , तो मेरे पति बनें।मेरे 'तथास्तु' कहकर कैलाश पर्वत पर आने पर तुमने वह प्रतिमा नदी में प्रवाहित कर दी॥45-46॥सखियों के साथ उस महाव्रत का पारण किया। हिमवान भी तब तक उस वन में तुम्हें खोजते हुए आ पहुँचे ॥47॥चारों दिशाओं में तुम्हारी खोज करते-करते वे व्याकुल हो चुके थे।इसलिए तुम्हारे आश्रम के समीप पहुँचते ही गिर पड़े ! थोड़ी देर बाद उन्होंने नदी के तट पर दो कन्याओं को सोते हुए देखा॥48॥



उन्होंने देखते ही तुम्हें छाती से लगा लिया और बिलखकर रोने लगे।फिर पूछा- हे पुत्री ! तुम सिंह, व्याघ्र आदि जन्तुओं से भरे इस वन में क्यों आ पहुँची ?॥49॥पार्वती ने उत्तर दिया -हे पिताजी, मैंने पहले ही अपने आपको शिवजी के हाथों सौंप दिया था, आपने मेरी बात टाल दी, इससे मैं यहाँ चली आयी ॥50॥हिमवान ने सान्त्वना दी कि हे पुत्री ! मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ न करूँगा। वे तुम्हें अपने साथ ले घर आये और मेरे साथ तुम्हारा विवाह कर दिये।इसी से तुमने मेरा अर्धासन पाया है।तबसे आज तक किसी के सामने मुझे यह व्रत प्रकट करने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ।॥51-52॥ हे देवि ! मैं यह बताता हूँ कि इस व्रत का "हरतालिका" नाम  क्यों पड़ा ? तुमको सखियाँ हर ले गयी थीं, इसी से हरतालिका नाम पड़ा ॥53॥पार्वतीजी ने कहा- हे प्रभो ! आपने नाम तो बताया, अब इसकी विधि भी बताएँ। इसका क्या पुण्य है, क्या फल है,यह व्रत कौन करे ?॥54॥श्री शिवजी पार्वतीजी से कहते हैं -हे देवि ! मैंने समस्त स्त्री-जाति कि भलाई के लिए यह उत्तम व्रत बतलाया है। जो स्त्री अपने सौभाग्य कि रक्षा करना चाहती हो वह यत्नपूर्वक इस व्रत को करे ॥55॥




केले के खम्भे आदि से सुशोभित एक सुन्दर मण्डप बनावे। उसमे रंग-बिरंग के रेशमी कपड़ों से चँदोवा लगाकर ॥56॥चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों से वह मण्डप लिपवावे। फिर शंख,भेरी ,मृदंग आदि बाजे बजाते हुए बहुत से लोग एकत्रित  होकर तरह-तरह के मंडळाचार करते हुए उस मण्डप में पार्वती तथा शिव जी कि प्रतिमा स्थापित करे ॥57-58॥ उस रोज दिन भर उपवास कर बहुत से सुगन्धित फूल ,सुगंध और मनोहर धुप ,नाना प्रकार के नैवेध आदि एकत्र कर मेरी पूजा करे और रातभर जागरण करे ॥59॥ ऊपर जो-जो वस्तुएँ गिनाई गई हैं उनके अतिरिक्त नारियल , सुपारी, जम्बीरी निम्बू ,लौंग ,अनार ,नारंगी आदि जो-जो फल प्राप्त हो सकें उन्हें इकटठा कर लें। ॥60॥ उस ऋतू में जो फल तथा फूल मिल सकें विशेष रूप से रखें। इसके बाद धुप, दीपादि से पूजन कर प्रार्थना करें ॥61॥ हे शिव ! शिवरूपिणि, हे मंगले ! सब अर्थो को देनेवाली हे देवि ! हे शिवरुपे ! आपको नमस्कार है।॥62॥ हे शिवरूपे ! आपको सदा के लिए नमस्कार है, हे ब्रह्मरूपिणी ! आपको नमस्कार है, हे जगद्धात्री ! आपको नमस्कार है ॥63॥


हे सिंहवाहिनी ! संसार के भय से भयभीत मुझ दिन कि रक्षा करें। इस कामना कि पूर्ति के लिए मैंने आपकी पूजा की है ॥64॥ हे पार्वती ! मुझे राज्य और सौभाग्य  दें, मुझपर प्रसन्न होवें।इन्हीं मन्त्रों से पार्वती तथा शिवजी की पूजा करे ॥65॥तदन्तर विधिपूर्वक कथा सुनें और ब्राम्हण को वस्त्र ,गौ ,सुवर्ण आदि देवे॥66॥ इस तरह एकाग्रचित होकर स्त्री-पुरुष दोनों एक साथ पूजन करें।फिर वस्त्र आदि जो कुछ हो उसका संकल्प करें ॥67॥ हे देवि ! जो स्त्री इस प्रकार पूजन करती है वह सब पापों से छूट जाती है और उसे सात जन्म तक सुख तथा सौभाग्य प्राप्त होता है ॥68॥जो स्त्री तृतीया तिथि का व्रत न कर अन्न भक्षण करती है ,तो वह सात जन्म तक बन्ध्या रहती है और उसको बार-बार विधवा होना पड़ता है ॥69॥वह सदा दरिद्र ,पुत्र-शोक से शोकाकुल , स्वभाव की लड़ाकी,  सदा दुःख भोगने वाली होती है और उपवास न करने वाली स्त्री अन्त में घोर नरक में जाती है ॥70॥मांसाहार करने से बाघिन , दही खाने से बिल्ली ,मिठाई खाने से चींटी और कुछ खाने से मक्खी होती है ॥71-72॥

तीज को अन्न खाने से सूकरी, फल खाने से बंदरिया ,पानी पिने से जोंक, दूध पीने से साँपिन, उस रोज सोने से अजगरी और पति को धोखा देने से मुर्गी होती है , इसलिए सभी स्त्रियाँ व्रत अवश्य करें ॥73॥ दूसरे दिन सुवर्ण ,चाँदी, तांबा अथवा बांस के पात्र में अन्न भरकर ब्राम्हण को दान दें और पारण करें ॥74॥जो स्त्री इस प्रकार व्रत करती है ,वह मेरे समान पति पाती है और जब वह मरने लगती है ,तो तुम्हारे समान उसका रूप हो जाता है।उसे सब प्रकार के सांसारिक भोग और सायुज्य मुक्ति मिल जाती है ॥75॥ इस हरतालिका की व्रत-कथा मात्र सुन लेने से प्राणी को एक हजार अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने में फल प्राप्त होता है ॥76॥ हे देवि ! मैंने सब व्रतों में उत्तम व्रत बतलाया, जिसके करने से प्राणी सब पापों से छूट जाता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं ॥77॥


♦️इति हरितालिका व्रत कथा ♦️


नोट :- पूजन विधि और कथाएँ तो अनंत है पर पूजा भाव से किया जाता है-शक्ति या सामर्थ्य के अनुसार या जहाँ तक हो सके पूजन करें ।

बिहार लोकगीत के सभी पाठकों को हरतालिका तीज व्रत की शुभकामनाएं ! हम आशा करते हैं कि भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा आप पर सदैव बनी रहे हरतालिका तीज व्रत एवं पूजा विधि पर यह आर्टिकल आपको कैसा लगा कमेंट करें ।

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